उदय सिंह
अन्नपूर्णा, अन्न की अधिष्ठात्री देवी (दुर्गा का एक रूप) काशी में इनका बड़ा माहात्म्य है। इन दिनों कनाडा से लाई गईं "नई अन्नपूर्णा" की खंडित मूर्ति को नवनिर्मित काशी विश्वनाथ कारीडोर में रानी भवानी स्थित उत्तरी गेट के बगल में 15 नवंबर को प्रतिष्ठापित किया गया है। हिंदू धर्म शास्त्रों में खंडित प्रतिमा को मंदिर में प्रतिष्ठापित करना वर्जित है। प्रख्यात ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर वास्तु विद्या के भी महान आचार्य थे। उनकी रचना बृहत्संहिता वास्तुशास्त्र और प्रतिमाशास्त्र पर ही आधारित है। उन्होंने खंडित प्रतिमा का निषेध किया है।
पुराण ग्रन्थ भी वास्तुशास्त्र का विवरण प्रस्तुत करते हैं। इसमें मत्स्य पुराण सर्वाधिक उल्लेखनीय है जिसमें मूर्तिकला से सम्बन्धित विवरण विस्तार से दिये गये हैं। वास्तु शास्त्र के कुछ प्राचीन आचार्यों के नाम भी हैं। भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित, विशालाक्ष, पुरन्दर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र और बृहस्पति स्थापत्यकला और मूर्ति के बारे में विवरण प्रस्तुत करते हैं। खंडित प्रतिमा पर लगभग सभी एकमत रहे हैं कि इसको मंदिर में रखने से नकारात्मक ऊर्जा फैलती है। इस लिए उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। गंगा और देश अन्य पवित्र नदियों की तलहटी में खोजें तो सैकड़ों टूटी हुई मूर्तियां मिल जाएंगी।
काशी की प्राचीनता वैदिक युग तक जानी जाती है। रामायण महाभारत में भी इसकी महत्ता का गुणगान है। संस्कृत शिक्षा का केंद्र रही काशी में सदियों से धर्म-कर्म और अध्यात्म की सीख देने के लिए विद्वानों जमघट लगा रहता है, लेकिन कनाडा से लाकर स्थापित की गई इस खंडित मूर्ति पर कोई कुछ नहीं बोल रहे हैं। बल्कि अवाक और नि:शब्द हैं। अन्नपूर्णा की मूर्ति के बारे में बताया जा रहा है कि इसको काशी के किसी स्थान से "मैकेंजी" नामक यात्री कनाडा लेकर चला गया था, लेकिन कब और कहां से चुराया था यह किसी को नहीं मालूम। मूर्ति कितनी पुरानी है इसका न तो कोई रिकार्ड है और न ही कोई बताने को तैयार है। जबकि आधुनिक युग में रेडियोकार्बन डेटिंग (आयु निर्धारण) की विधि से लाखों वर्ष पहले निर्मित वस्तुओं की तिथि आसानी से पता लगाया जा सकता है। रेडियोकार्बन किसी भी वस्तु के नाइट्रोजन के क्षय पर निर्भर करती है।
काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर से थोड़ा हटकर एक और अन्नपूर्णा देवी हैं,(असली अन्नपूर्णा) जिसका विशाल मंदिर है। इसका निर्माण पेशवा बाजी राव (1720-1740) ने करवाया था। जहां आज अच्छी खासी कमाई होती है। विशेषतौर पर धनतेरस के दिन यहां दर्शन और पूजन के लिए काफी लंबी लाइन लगती है, कहा जाता है कि इनकी महिमा से यहां कोई भी भूखा नहीं रहता। इस मंदिर का काशी अन्नपूर्णा अन्नक्षेत्र ट्रस्ट और कई शिक्षण संस्थाएं संचालन करती हैं। ट्रस्ट को हर साल करोड़ों की आमदनी होती है। नई प्रतिमा पर काशी दो गुटों बंटी हुई दिख रही है। कह सकते हैं कि कहीं खुशी कहीं गम है।
अभी सिर्फ तीन वर्ष पहले की बात है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा वाराणसी आईं थी। काशीविश्वनाथ का दर्शन करने। इसका काशी में काफी विरोध किया गया था, क्योंकि वह ईसाई धर्मावलंबी परिवार से ताल्लुक रखती हैं। हालांकि कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने मंदिर के गर्भगृह में जाकर दर्शन पूजन किया गया। आक्षेप लगाया गया कि प्रियंका के दर्शन करने से हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। आज 100 वर्षों तक कनाडा में रही खंडित मूर्ति को कितना वाजिब माना जाए।
देवी-देताओं, धर्म-कर्म, मठ-मंदिर और जाति-पात के नाम पर काशी में ठगी नई बात नहीं है। यह सब यहां सदियों से होता आ रहा है। अन्नपूर्णा की नई प्रतिमा की स्थापना भी इससे कुछ खास अलग नहीं है। यहां होने वाली धनवर्षा आकर्षण केंद्रबिंदु है। काशी विश्वनाथ कारीडोर धार्मिक कम पर्यटन की नई ठौर ज़्यादा बन रहा है। किसी जमाने में होमगार्ड की नौकरी करने वाले को नई अन्नपूर्णा की प्रतिमा का पुजारी बनाया गया है, जो पिछले चार पांच वर्षों में करोड़ों की संपत्ति बना चुके हैं।
Uchch..!
ReplyDeleteLaman Sylvania ka add yaad aa raha h...
ReplyDeletePoore Ghar ka badal dalunga....
Theek usi prakar se ab pure desh ka ..
Political discourse
Religious beliefs
Devi dewata..
Parliament
Roads & cities k naam..
Sab badal ja rahe h...!!!
Global gyaan
ReplyDeleteBahut sunder
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