Thursday, 30 December 2021

काम, क्रोध और लोभ की जकड़ में साधु संत


 उदय सिंह

चिंतन-मनन करने वाले को मुनि कहते हैं, और ईश्वर की साधना, उपासना व भक्ति में लीन रहने वाला साधु होता है। धार्मिक व धर्मपरायण इंसान को संत कहा जाता है। भगवान के चरण-कमलों को छोड़कर उनको न अपनी देह प्रिय होती है और न घर। अभ्यास, यज्ञ, तप, श्रद्धा, व्रत, नियम, योग द्वारा परम ब्रह्म के स्वरूप को जानने का वह प्रयत्न करते हैं। कहते हैं अपने देश में त्रिकालदर्शी ऋषि और मुनि हुए हैं, लेकिन अब परिस्थिति काफी बदल चुकी है। गेरुआ रंग का चोला पहनकर साधु संत विलासितापूर्ण जीवन का आनंद ले रहे हैं। नेतागीरी करते हैं, चुनाव लड़ते हैं, मिथ्या भाषण और बढ़ चढ़कर राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं। तुलसीदास ने रामचरित्र मानस में  संतों के कुछ लक्षण बताए हैं। षटविकार जित अनध अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुख धामा। अमितबोध अनीह मित भोगी। सत्यसार कवि कोबिद जोगी। सावधान मानद मद हीना। धीर धर्म गति परम प्रवीना। आज साधु-संत काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के जाल में जकड़ गए हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो हजारों करोड़ की कंपनी के मालिक बन गए हैं।  

राष्ट्रपिता को अपशब्द  

एक संत हैं कालीचरण महाराज। इनका व्यक्तित्व फिल्मी अभिनेता जैसे है। आकर्षक दिखने के लिए श्रृंगार करते हैं। रायपुर में आयोजित धर्म संसद में इन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपशब्द तक कह दिया। कहा मैं नाथूराम गोडसे को नमन करता हूं जिन्होंने उस (.... अपशब्द ) को मार डाला। क्या यह एक संत की वाणी है? कालीचरण महाराज कहते हैं कि मैं फैशन के अनुरूप कपड़े पहनता हूं, मुझे अच्छा लगता है। मैं टीशर्ट पहनता हूं। जरी वाले कपड़े पहनता हूं, जिम जाता हूं, जिम का मुझे बहुत शौक रहा है। पूजा पाठ कब करते हैं इसका जिक्र कभी नहीं करते। 

साधु-संत का अर्थ 

साधु का अर्थ है धार्मिक, धर्मपरायण, उत्तम कुल में जन्मा, सज्जन व्यक्ति। संन्यासियों को भी साधु कहते हैं। गरुड़ पुराण में लिखा है जो सम्मान से प्रसन्न तथा अपमान से क्रोधित नहीं होते और यदि कभी नाराज भी हो गए तो कठोर वचन नहीं बोलते, वे ही साधु हैं। साधु सुख भोग की प्राप्ति की इच्छा से विरक्त रहते हैं और संपूर्ण प्राणियों के सुख के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। साधु पराए दुख से दुखी होते हैं। दूसरों के दुखों को देखकर अपने सुखों को भूल जाते हैं, जैसे वृक्ष स्वयं सूर्य-ताप सहकर दूसरों को छाया देते हैं उसी प्रकार साधु भी कष्ट सहकर दूसरों का उपचार करते हैं। महानिर्वाण तंत्र में लिखा है जो मनुष्य देवायतन में निवास करते हैं तथा देवकल्प, दृढव्रत, सत्य-धर्मपरायण तथा सत्यवादी हैं उन्हें साधु कहते हैं। संत का अर्थ है अंजलि। धर्मात्मा, साधु या गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वाले असीम ज्ञानवान, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ साधु को भी संत कहा जाता है। 

मुनि और संन्यासी का अर्थ 

मुनि का अर्थ है चिंतन और मनन करने वाला। ईश्वर की सगुण भक्ति के मार्ग को पारकर निर्गुण भक्ति में प्रवेश करने वाला मुनि है। उपनिषदों में मुनियों को बहुत निग्रही बताया गया है। गीता में बताया गया है कि जिसका मन दुखों में उद्वेग रहित है और सुखों की प्राप्ति में स्पृहा नहीं रखता और जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं. ऐसे मुनि को स्थिर बुद्धि कहा जाता है। गरुड़ पुराण में लिखा है कि मुनि गण संपूर्ण वासनाओं का त्याग कर एकमात्र विष्णु में लीन रहते हैं। वे तर्पण, होम, संध्यावंदन आदि क्रियाओं द्वारा भगवान को प्राप्त करते हैं। भगवान के अतिरिक्त इस जगत में उनके लिए कोई नहीं है। वे इस संसार को नश्वर समझते हैं। वे संसार से पूर्ण विरक्त हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। सन्यास का अर्थ सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर निष्काम भाव से प्रभु का निरन्तर स्मरण करते रहना। शास्त्रों में संन्यास को जीवन की सर्वोच्च अवस्था कहा गया है।

संत का तुगलकी फरमान

हरिद्वार में आयोजित "धर्म संसद" में एक साधु ने कहा कि इस संसद से जो "अमृत" निकलेगा वो धर्मादेश होगा और लोकतांत्रिक सरकारें उसे मानने को बाध्य होंगी। यदि नहीं यह सरकारें मानतीं तो 1857 के विद्रोह से भी भयानक युद्ध लड़ा जाएगा। किसी होटल में क्रिसमस या ईद मनाया गया है तो शीशे तुड़वा दिये जाएंगे। क्या यह संतों की भाषा है। विद्रोह तो अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए किया गया था। यह संत किस हुकूमत को उखाड़ेंगे।

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स्रोत:- शब्द संस्कृति, प्रकाशन विभाग, भारतीय दर्शन, पुराण कोश, शब्द कोश ज्ञानमंडल वाराणसी।

Wednesday, 29 December 2021

दुर्गंधयुक्त राजनीति की शिकार गंगा

 उदय सिंह

गंगा पवित्र हैं। पतित पावनी हैं। मोक्ष प्रदायिनी हैं। सदापुण्या हैं। भगीरथसुता हैं। जाह्नवी हैं। मंदाकिनी हैं। ऐसे ही सैकड़ों नामों वाली सदानीरा को कहा जाता है कि वह विष्णु के चरणों से निकलकर ब्रह्मा के कमण्डल में समाती हुई शिव की जटा में आश्रय लेती हैं। हिमालय के गोमुख से गंगोत्री हिमनद से भागीरथी नदी निकलती है और देवप्रयाग में अलकनंदा से मिल जाती है। यहीं से गंगा का निर्माण होता है, कहा जाता है कि इक्ष्वाकुवंशीय सम्राट राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ के कठोर तप के बाद गंगा का अवतरण धरती पर हुआ। इसकी पवित्रता पर लोग सौगंध खाते हैं। वाराणसी में तो इसमें स्नान करने से ही मोक्ष की प्राप्त हो जाती है। लेकिन यह सब सरित्श्रेष्ठा का अतीत है। वर्तमान में इसके अस्तित्व और हकीकत की तलहटी में जाएंगे तो ऐसा कुछ भी महसूस नहीं होगा। गाद, सिल्ट राजनीति, दुर्गंध और सड़ी हुई लाशें जरूर दिख जाएंगी।

 हजारों करोड़ गंगधार में प्रवाहित 

ऋग्वेद, पुराण, धर्मशास्त्र, रामायण और महाभारत से लेकर लगभग समग्र साहित्य में गंगा का ईश्वरीय महात्म्य अस्सी के दशक तक आते-आते सड़ांध और बदबू में परिवर्तित हो जाता है। ऋषिकेश और हरिद्वार तक कुछ गनीमत है, लेकिन पूरब की ओर बढऩे पर प्रदूषण और नारकीय हो जाता है। कानपुर में डुबकी लगाना तो दूर, वहां खड़े होकर सांस लेना भी मुश्किल है। गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए दशकों से नारेबाजी जारी है। अब तक हजारों करोड़ इसकी जलधारा में प्रवाहित हो चुके हैं। नतीजा सिफर है। 

प्रदूषण बेरोकटोक अब भी बरकरार 

1985 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई। हजारों करोड़ खर्च हुए फिर भी गंगा मैली ही रह गईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा में प्रदूषण को नियंत्रित करने लिए 2014 में नमामि गंगे परियोजना शुरुआत की। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2021 तक नमामि गंगे परियोजना के लिए 30,255 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं। यह धन कहां गया कोई नहीं जानता। निर्मल गंगा के लिए नेशनल मिशन फार क्लीन गंगा (एनएमसीजी) की स्थापना हुई, फिर भी गंगा की सेहत पर कोई खास सुधार नहीं हुआ। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने अभी हाल ही में कहा है कि पिछले 36 वर्षों से निगरानी के बावजूद गंगा की सफाई अब भी चुनौती है। सफाई के लिए आवंटित फंड के उपयोग की जवाबदेही तय करने करने की जरूरत है। 

गंगा में ही गिरता जहरीला कचरा 

गंगा में टिहरी बांध, फरक्का बांध और भीमगोडा जैसी विशाल बांध बने हुए हैं। इन बाधों से इसका वेग खत्म हो गया है। गंगा प्रदूषण खत्म करने के लिए इसके किनारे स्थित 48 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का आदेश भी दिया गया था, पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई है। ऋषिकेश से लेकर कोलकाता तक गंगा के किनारे परमाणु बिजलीघर से लेकर रासायनिक खाद तक कई कारखाने लगे हैं। जिसका जहरीला कचरा गंगा में ही गिरता है। 

पारस्थितिकी हो रही असंतुलित 

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले से बंगाल के सुन्दरवन तक 2525 किलोमीटर भू-भाग इसी महानदी के कारण सदाबहार है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल तक दर्जनों नदियां इसमें समा जाती हैं। लगभग पचास करोड़ लोगों के साथ लाखों जीव जन्तुओं का अस्तित्व इस पर निर्भर है। गंगा के पर्वतीय किनारों पर लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू, लोमड़ी, हिरण, भौंकने वाले हिरण, साम्भर, कस्तूरी मृग, बरड़ मृग, साही, तहर आदि काफी संख्या में मिलते हैं। लेकिन प्रदूषण की वजह से यह जीव विलुप्त हो रहे हैं।

Friday, 17 December 2021

बनारसी पान की महिमा

 उदय सिंह

भारत में पान (ताम्बूल) खाने के बहुत शौकीन हैंं, लेकिन बनारस में पान खाने की दीवानगी है। कुछ लोग सुबह पान का ही नाश्ता करते हैं। कह सकते हैं कि यहां हर चौथा या पांचवां व्यक्ति पान खाने का लुत्फ उठाता है। पक्का बनारसी मुंह में पान की गिलोरी दबाकर आप से यूरोप और अमेरिका की राजनीति व संस्कृति के बारे में कुछ चुनिंदा गालियों के साथ ऐसे बात करेगा जैसे अभी-अभी वहां से लौटकर आया है। कहते हैं बनारस में गालियों का अपना अलग सौंदर्यशास्त्र है। यहां पान खाना शौक नहीं, शान है। पान की शान में कई जुमले मशहूर हैं। पान से मुंह की सुंदरता बढ़ती है। तन-मन सुगंधित और शुद्ध होता है। लेकिन इसकी कीमत यहां की दर-ओ-दीवार को चुकानी पड़ती है। शहर की शायद ही कोई ऐसी इमारत होगी जहां पान के पीक की बौछार न हुई हो।

बनारस में "रुद्राक्ष" अत्याधुनिक अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर बना है। इसको जापान और भारत की दोस्ती का प्रतीक माना जाता है। कुछ महीने पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया था। अब रुद्राक्ष जाएंगे तो गौर से देखने पर कोनों में पान के शौकीनों के निशां आसानी से दिख जाएंगे। शहर की इमारतों व रेलवे स्टेशन और सड़कों पर जगह-जगह पान के पीक की डिजाइन दिख जाएंगे। राह चलते तिकोना मुंह बनाकर और पतली लंबी धार के साथ पान की थूकेंगे। दफ्तरों जहां लिखा हो कि पान खाकर थूकना मना है, वहां जरूर थूकेंगे। एक सज्जन दिखे, पान खाकर मास्क लगाए थे, थूक दिये पूरा मास्क रंगीन हो गया, फिर हीं हीं हीं करने लगे।

अपने देश में पान खाकर कहां थूूका जाए कहां नहीं इस पर कोई ठोस कानून नहीं है। हाँ मुगल बादशाह और नवाबों के साथ पीकदान ज़रूर चलता था। कुछ साल से पहले दुबई में सरकार ने पान या पान के पत्तों के आयात पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था। गोवा ने करीब 15 साल पहले सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिनियम के तहत पान और गुटखा पर प्रतिबंध लगा दिया था। देश के कुछ अन्य राज्यों ने भी इसी अधिनियम के अंतर्गत प्रतिबंध लगा दिया है। बावजूद इसके पान व गुटखा की बिक्री बेरोकटोक होती है। 

दक्षिण एशियाई देशों में पान अधिक मिलता है। हालांकि पान का उद्भव स्थल मलाया द्वीप को माना जाता है। इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इसके औषधीय गुणों की शास्त्रों, पुराणों से लेकर रीतिकालीन कवियों और सिनेमा में भी बड़ी प्रशंसा मिली है। भारतीय इतिहास एवं परंपरा से इसका गहरा जुड़ाव है। अभिनेता अमिताभ बच्चन, आमिर खान या फिर करीना कपूर सब बनारस आने पर पान का शौक फरमाते हैं। पान खाने की प्रथा हिंदू-मुसलमान दोनों में बिना भेदभाव के समान रूप प्रचलित है। विटामिन सी, थायमिन, नियासिन, राइबोफ्लेविन, कैरोटीन और कैल्शियम काफी मात्र मिलता है। पान की महिमा अतंत है।