Wednesday, 8 October 2025

फिर छिड़ी बात कुत्तों की...


उदय सिंह

इन दिनों देश में सर्वाधिक चर्चा कुत्तों की है। शायद ट्रंप के टैरिफ से भी ज्यादा। जहां देखो वहीं आवारा कुत्तों का आतंक। लिहाजा उन्हें पकड़ा जा रहा है। मारा जा रहा है। "ठिकाने" भी लगाया जा रहा है। क्योंकि "सुप्रीम आदेश" मिला है। देखा जाए तो यह साल कुत्तों की धर पकड़ में ही गुजर रहा है। मतलब इसे "डॉग इयर्स" कहेंगे। लेकिन यहां नोबेल पुरस्कार से सम्मानित जर्मन उपन्यासकार, कवि और नाटककार गुंटर ग्रास का "डॉग इयर्स" नहीं है, जो 1963 में प्रकाशित हुआ था। बल्कि असली कुत्तों की बात हो रही है। गुंटर ग्रास का तो 20वीं सदी में जर्मनी की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास है, जो वाइमर गणराज्य से लेकर नाज़ी युग, द्वितीय विश्व युद्ध और युद्धोत्तर काल तक व्यंग्य करता है। फ़ासीवादी अंतर्धाराओं की निरंतरता का विश्लेषण करता है। उपन्यास तर्क देता है कि जर्मनी ने नाज़ी पापों का सामना करने के बजाय उन्हें दबा दिया, अपराधबोध को "भूमिगत" रहने दिया। लेखक नाज़ियों के उत्पाती पाखंड को उजागर करता है, कहता है कि इतिहास के कुत्ते भौंकते ही रहते हैं।

हां तो, हम कुत्तों की चर्चा की बात कर रहे थे। कुत्ते सच में वफादारी की मिसाल हैं। हम सभी इससे वाकिब हैं। रूप-रंग, भूमिकाएं अनेक हैं। कोई सौम्य तो कोई खूंखार है। आज दुनिया में 400 से अधिक नस्ल इनकी विकसित की जा चुकी है। हजारों साल से इंसानों की सोहबत में हैं बावजूद अपनी आबादी के अनियंत्रित बढ़ोत्तरी से मौजूदा वक्त में दुश्मनी बढ़ गई है। आजिज होकर सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ता है कि आवारा कुत्तों की नसबंदी की जाए। एंटी रेबीज टीका लगाकर कहीं दूर छोड़ दिया जाए। आखिर उन्हें सजा तो सुनाई नहीं जाएगी। लेकिन हां, एक बार पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक कुत्ते को एक सप्ताह जेल में रखने के बाद मौत की सज़ा सुनाई गई थी, लेकिन वह एक दुर्लभ घटना थी। अपने देश में तो कुत्तों को बांधकर बेरहमी पीटा जा रहा है। पीट-पीटकर हत्या कर हो रही है। बोरियों में भरकर "ठिकाने" लगा रहे हैं।

कुत्ते भी कुछ कम नहीं हैं। आखिर कुत्ते ही हैं। अभी हाल ही में केरल के कन्नूर में एक अजीबोगरीब घटना हुई। कुत्तों से सतर्क रहने के किए नुक्कड़ नाटक हो रहा था। कलाकार आवारा कुत्तों के काटने का अभिनय कर रहा था। लाउड स्पीकर पर भौं-भौं भौंक रहा था, तभी मंच पर एक कुत्ता आ गया और कलाकर के पैर में काट लिया। कुछ कुत्ते और भी आ गए। भगदड़ की स्थिति में कुत्तों ने बच्चों को भी काट लिया। नाटक का दिलचस्प हिस्सा यह था कि दर्शकों को लगा कि मंच पर कुत्ते का आना इत्तेफाक नहीं बल्कि नाटक का ही हिस्सा है।

 पौराणिक कथा, साहित्य, सिनेमा और खेल की दुनिया में भी कुत्तों की महिमा और वीरगाथा का वर्णन मिलता है। संस्कृत में इन्हें श्वान कहा गया तो गांवों में कुकुर की संज्ञा दी गई। वैज्ञानिकों ने इनका नाम कैनिस ल्यूपस फैमिलिएरिस रखा है। कहा जाता है कि यह ग्रे भेड़ियों (कैनिस ल्यूपस) की एक उप-प्रजाति हैं। हिंदू धर्म में भगवान भैरव को कुत्ते का स्वामी माना जाता है। तो नेपाल में तो "कुकुर तिहार" नामक एक त्योहार भी होता है। जब इनकी पूजा की जाती है, फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं। प्राचीन मिस्र की पौराणिक कथाओं में भी "अनुबिस" नामक कुत्ते के सिर वाले देवता हैं, जिन्हें अंत्येष्टि संस्कार का देवता कहा जाता था। 

सुनकर थोड़ा अजीब लगेगा लेकिन यह सच है कि दुनिया की विकास यात्रा में कुत्तों का भी योगदान इंसानों से कम नहीं है। बात 1957 की है जब सोवियत संघ "स्पुतनिक 2" अंतरिक्ष यान भेज रहा था। तब "लाइका" नामक कुतिया को भी यान के साथ अंतरिक्ष में भेजा। हालांकि वह जीवित नहीं बची, लेकिन सोवियत संघ अंतरिक्ष में किसी जीवित प्राणी को भेजने वाला पहला देश बन गया। महान विश्वविजेता "सिकंदर" की जान को भी एक कुत्ते ने ही बचाई थी। सिकंदर के पास "पेरिटास" नाम का एक कुत्ता था। माना जाता है कि इस वफ़ादार कुत्ते ने भारत में एक युद्ध के दौरान सिकंदर की जान बचाई थी। उसने घायल सिकंदर को हमलावर से बचाया था अगर सिकंदर इस युद्ध में जीवित नहीं बचता, तो जिस सभ्यता को आज हम जानते हैं, उसका अस्तित्व ही नहीं होता।

 जब हर जगह कुत्ते ही कुत्ते हैं तो भला इतिहासकार क्यों पीछे रहेंगे। इतिहासकारों ने भी इन पर खूब काम किया है। किताबों में झांको तो पता चलेगा कि सबसे पहले कुत्तों के अवशेष जर्मनी के बान-ओबरकासेल में करीब 14,000 वर्ष पहले मिले हैं, जो इंसानों के साथ दफनाए जाते थे। इनके पालतू बनाने की प्रक्रिया इससे थोड़ा पहले मानी जाती है, जो आनुवंशिक रूप से भेड़ियों के वंशज थे। माना जाता है भेड़िए इंसानों के शिविरों के आसपास बचे हुए भोजन या जूठन खाकर धीरे-धीरे  मनुष्यों के आदी हो गए। वैश्विक स्तर पर कुछ विद्वानों का मानना है कि आज पूरी दुनिया में लगभग 90 करोड़ कुत्ते हैं। करीब 47 करोड़ कुत्ते पालतू हैं। दुनिया के लगभग 75% कुत्ते या तो खुले में घूमते हैं या आवारा हैं। लेकिन इनकी उपयोगिता और योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

Friday, 11 October 2024

"अजीब" दास्तां है


उदय सिंह


ये दास्तां थोड़ी अजीब है। वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म दिल अपना और प्रीत पराई का गीत ...अजीब दास्तां है ये, नहीं बल्कि चार्ल्स हूपर द्वारा निर्मित एक शतरंज खेलने वाली "ऑटोमेटन" मशीन "अजीब" की दास्तां है। जिसे 1865 में ब्रिस्टल कैबिनेट निर्माता चार्ल्स हूपर ने बनाया था। दुनिया के अनेक महान शतरंज और चेकर्स मास्टर्स ने इसका संचालन किया। अजीब आकार में 10 फीट ऊंचा था। सबसे पहले 1868 में लंदन के रॉयल पॉलिटेक्निकल इंस्टीट्यूट में इसको प्रदर्शित किया गया था। 1868 और 1876 के बीच क्रिस्टल पैलेस में रखा गया। इसके बाद 1877 तक वेस्टमिंस्टर के आकर्षक रॉयल एक्वेरियम की शोभा बढ़ाया। बहुत जल्द ही यूरोप में इसकी मकबूलियत फैल गई और जर्मनी की राजधानी बर्लिन तक पहुंची गई, जहां सिर्फ तीन महीने के अंदर ही एक लाख से अधिक लोगों ने इसका दीदार किया। 

अजीब नाम अरबी शब्द  से लिया गया है। जिसका अर्थ है "अद्भुत"। यह सचमुच अद्भुत था। अजीब के ऑपरेटरों में एक शतरंज और चेकर्स मास्टर्स कॉन्स्टेंट फर्डिनेंड ब्यूरिल थे। 1885 में जब अजीब न्यूयॉर्क आया तो वह भी इसके ऑपरेटर थे। ब्यूरिल पेरिस में जन्मे अमेरिकी शतरंज मास्टर थे। ऑपरेटर के रूप में उन्होंने शतरंज के 900 से अधिक खेल खेले, केवल 3 गेम हारे। इसके अलावा उन्होंने कभी भी एक भी चेकर गेम नहीं हारा। 1889 में न्यूयॉर्क शहर में 15वां स्थान प्राप्त किया (छठी अमेरिकी शतरंज कांग्रेस मिखाइल चिगोरिन और मैक्स वीस द्वारा जीती)। अमेरिकी चेकर्स चैंपियन चार्ल्स बार्कर ने भी अजीब पर काम किया और एक भी गेम नहीं हारे। अमेरिकी राष्ट्रपति भी अजीब के आकर्षण से बच नहीं पाए। 22वें और 24वें अमेरिकी राष्ट्रपति का पद को सुशोभित करने वाले स्टीफन ग्रोवर क्लीवलैंड ने भी अजीब को खेला। 

अरबी में शतरंज का पहला उल्लेख 720 में अरबों के सबसे महान शास्त्रीय कवियों में शुमार अल-फ़राज़दक की रोमांटिक कविताओं में मिलता है। कहते हैं फ़ारसी चतरंग का अरबीकृत नाम शतरंज बन गया। खैर, शतरंज को छोड़िए, अजीब की बात करते हैं। एक बार प्रतिद्वंद्वी ने गेम हारने के बाद अजीब पर गोली चला दी और उसका ऑपरेटर घायल हो गया। जब अजीब को न्यूयॉर्क के ईडन म्यूसी में प्रदर्शित किया गया तो इसका काफी विरोध भी हुआ। विरोधियों में अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट भी शामिल थे। हंगरी मूल के अमेरिकी बाज़ीगर, स्टंट कलाकार और सनसनीखेज कारनामों के लिए प्रसिद्ध हॅरी हुडीनी, अमेरिकी लेखक विलियम सिडनी पोर्टर (ओ हेनरी) भी विराधियों में थे। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के शुरुआती दशकों की एक फ्रांसीसी मंच मशहूर अभिनेत्री सारा बर्नहार्ट को अजीब रास नहीं आया था उन्होंने भी इसका सार्वजनिक विरोध किया। इतने विरोध का सामना करते हुए आखिर 1929 में न्यूयॉर्क शहर के ब्रुकलिन नगर के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित कोनी द्वीप पर आग लगने से अजीब नष्ट हो गया, और इतिहास बन गया।

Thursday, 21 March 2024

काशी की होली और दुनिया की होली

उदय सिंह

त्योहार जीवन में नया जोश लाते हैं। पुरानी स्मृतियों को ताजा करते हैं, और चिंताओं को कुछ समय लिए भुला देते हैं। होली भी ऐसा ही त्योहार है, जो भारत के अलावा दुनिया के कई हिस्सों में मनाया जाता है।इनमें गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगोमॉरीशस, फिजी और दक्षिण अफ्रीका प्रमुख है। भारतीय मूल के कुछ अन्य कैरेबियाई समुदायों में भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है। पड़ोसी मुल्‍क नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी हिंदू  होली मनाते हैं। होली का वर्णन न जाने कितने ग्रन्थों में आया है। इसमें सभी लोग एक दूसरे को चंदन, गुलाल, रंग और अबीर लगाते हैं। वसंत की ऋतु में मनाए जाने की वजह से होली को वसंतोत्सव भी कहा जाता है।

काशी में एक विचित्र होली मनाई जाती है। "मसाने की होली" इसे भगवान शिव महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर चिताओं के भस्म से अपने गणों, भूत-प्रेत, पिशाच, यक्ष, गंधर्वों और जीव जंतुओं के साथ खेलते हैं। पुराणानुसार यक्ष सुयशा और प्रचेता की संतान हैं, इनकी आकृति विकराल होती है इनमें बोसासियस, इंदारियास, बोननस, मेनोगियास और अलाटस प्रमुख हैं। गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख थे। गंधर्व दो प्रकार के माने गए हैं ये सोमरस के रक्षक, रोगों के चिकित्सक, सूर्य के अश्वों के वाहक, तथा स्वर्गीय ज्ञान के प्रकाशक माने गए हैं। यम और यमी के उत्पादक भी गंधर्व ही कहे गए हैं। ये सभी शिव के साथ मसाने की होली खेलते हैं। इसके बाद सब लोग उल्लास और उमंग से होली खेलते हैं।

हिंदुओं के त्योहार में आनंद है, जिसमें सभी तरह की प्रवृत्तियों और मनोवृतियों की अभिव्यक्ति परिलक्षित होती है। होलिका या होली हिंदुओं का एक बड़ा त्यौहार है। यह फाल्गुन महीने की अंतिम तारीख पूर्णिमा को देश के सभी हिस्सों में मनाया जाता है। इसी दिन एक मंवन्तर का आरम्भ होने से इसे मन्वादि भी कहते हैं। बीते हुए संवत का अंतिम दिन और आगामी संवत का प्रथम दिन दोनों इस उत्सव में शामिल हैं। होली प्रेम और सौहार्द्र का उत्सव है। अपनी परंपरा और संस्कृति को जीवित रखने के लिए इन उत्सवों का कायम रहना लाजिमी है। होली की उत्पत्ति के संबंध में कई तरह की बातें प्रसिद्ध हैं। पुराणों के अनुसार राक्षसराज हिरण्यकशिपु अपनी बहन होलिका को आदेश देता है कि उसके विष्णुभक्त बेटे प्रह्लाद को गोद में बैठाकर आग में भस्म कर दे, लेकिन वह स्वयं भस्म हो जाती है। कथानुसार गोद में बालक प्रह्लाद को लेकर होलिका की मूर्ति रख दी जाती है। निश्छल, निर्मल एवं निर्दोष भक्त प्रह्लाद होली की भीषण अग्निज्वालाओं के बीच भी पूरी तरह सुरक्षित रहेगा, यह आस्था अत्यंत मूल्यवान है। लेकिन भारतीय मन तो यही मानकर आश्वस्त होता है कि होली के साथ उसने पुराने संवत को भी जला दिया है।

होली त्‍योहार केवल हिन्‍दुस्‍तान ही नहीं बल्कि दुनिया के अनेक देशों में कुछ परिवर्तित रूप में देखने को मिला है। विश्‍व के प्राचीन देशों में शुमार यूनान की राजधानी एथेंस के शहर गैलेक्सिडी में कार्निवल सीजन की विदाई पर आटा से होली खेलने जैसी परंपरा है। यहां लोग एक-दूसरे पर आटा फेंककर जश्न मनाते हैं। रोम में भी होली सरीखा ही रेडिका त्‍योहार मनाया जाता है। इसमें लोग लकड़ियां एकत्रित करके उसे जलाते हैं। यह कमोवेश होलिका दहन जैसा ही नजारा होता है। इस दौरान लोग नाचते गाते हैं और मस्ती करते हैं। फन फेस्टिवल के रूप में एक दूसरे पर संतरे फेंकते हुए होली खेली जाती है। सांस्‍कृति रूप से मजबूत स्‍पेन में मनाया जाने वाला त्‍योहार बटाला डी विनो (शराब की लड़ाई) भी होली की याद दिलाता है। लोग एक दूसरे पर वाइन फेंकते हैं। टोमाटीना फेस्टिवल तो बिलकुल होली का ही अलग रूप है। दक्षिण कोरिया में बोरयॅान्ग मड फेस्टिवल मनाया जाता है। जिसमें लोग एक दूसरे पर कीचड़ फेंकते हैं। एक दूसरे को कीचड़ के टब में फेंकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में वाटरमेलन फेस्टिवल (तरबूज) होता है। इसमें एक दूसरे पर तरबूज फेंकते हैं और मस्ती हैं। अप्रैल के महीने में ही थाईलैंड में 'सोंगक्रान' नाम से फेस्टिवल का आयोजन होता है जिसमें लोग एक दूसरे के ऊपर रंग और ठंडा पानी फेंकते हैं। साउथ अफ्रीका में तो होली धूमधाम से मनाया जाता है। होलिका जलाई जाती है और एक दूसरे को रंग भी लगाया जाता है।


Thursday, 23 February 2023

यूक्रेन रूस युद्ध के एक साल

  उदय सिंह

रूस-यूक्रेन युद्ध को एक साल पूरे हो गए। आज ही के दिन 24 फरवरी 2022 को रूस ने दक्षिण-पश्चिम में यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया। एक साल में यूक्रेन की राजधानी कीव समेत लगभग सभी शहर बर्बाद हो चुके हैं। हजारों की संख्या में दोनों देशों के सैनिक मारे गए हैं। तीन दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन अचानक यूक्रेन की राजधानी कीव पहुंचे, और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से कहा कि अमेरिका जब तक जरूरत होगी तब तक यूक्रेन के साथ खड़ा रहेगा। गौर से देखा जाए तो बाइडेन के दौरे से युद्ध के और भड़कने की आशंका पैदा हो गई है। पहले तो केवल अंदाजा ही लगाया जा रहा था कि नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) युद्ध में कूदेगा, लेकिन अब यकीन के साथ कह सकते हैं कि यूक्रेन को नाटो का भरपूर सहयोग मिल रहा है। अन्यथा वह रूस के सामने एक महीने भी नहीं टिकता। अब दुनिया के सामने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बेबाकी से कह रहे हैं कि अमेरिका के नेतृत्व वाला नाटो रूस को बर्बाद करने करने पर तुला है। अमेरिका रूस के खिलाफ वैश्विक युद्ध छेड़ना चाहता है। लेकिन रूस को हराना असंभव है।

नाटो का खुल्लमखुल्ला विस्तार:

पोलैंड से ट्रेन के जरिये कीव राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा कि एक वर्ष पहले रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने जब यूक्रेन पर हमला करवाया था तब उन्होंने सोचा था कि यूक्रेन कमजोर है और पश्चिमी देश बंटे हुए हैं। लेकिन वह गलत साबित हुए। उन्होंने वादा किया कि शीघ्र ही 50 करोड़ डालर मूल्य के हथियार और गोला-बारूद यूक्रेन भेजे जाएंगे। उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की बहादुरी की खूब प्रशंसा की है। उधर, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि यूक्रेन में कार्रवाई जारी रहेगी। क्योंकि अमेरिका रूस की अर्थव्यवस्था को तबाह करना चाहता है और नाटो का विस्तार कर रहा है। यूक्रेन के बाद अब फिनलैंड और स्वीडन को भी नाटो में शामिल करने की अमेरिका की योजना है। वह रूस को बर्बाद करने की षडयंत्र रचकर विश्व को युद्ध की आग में धकेलना चाहता है।

रूस न्यू स्टार्ट एटामिक ट्रीटी से अलग हुआ:

  शीतयुद्ध समाप्ति के बाद अब दुनिया के सामने दो महाशक्तियों के टकराने की आशंका बलवती होती जा रही है। क्योंकि रूस न्यू स्टार्ट एटामिक ट्रीटी से अलग हो गया है। यह संधि 2011 में हुई थी, जिसके अंतर्गत 700 रणनीतिक लांचरों 1550 परमाणु हथियार रूस और अमेरिका की ओर से तैनात किए जा सकते थे। लेकिन संधि फरवरी 2021 में ही समाप्त हो रही है। यूरोपीय देशों को चेतावनी देते हुए पुतिन ने न्यू स्टार्ट ट्रीटी को खत्म करने का एलान कर दिया है। इसके तहत परमाणु हथियारों को लेकर दोनों में पारदर्शिता बनाए रखनी थी। परमाणु संख्या सीमित रखनी थी। लेकिन यूक्रेन युद्ध से पैदा तनाव के बीच पुतिन ने समझौता तोड़कर आशंकाएं बढ़ा दी हैं। यह रूस और अमेरिका के बीच अंतिम बड़ा समझौता है जिसे तोड़ दिया गया है। पुतिन ने अत्याधुनिक सरमट मल्टी-वारहेड इंटरकांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल तैनाती की घोषणा की है। यह विध्वंसक मिसाइल हाइपरसोनिक मिसाइल है जो एक साथ 10 से 15 परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता रहखती है। अमेरिका सहित कोई अन्य देश इस मामले में रूस के बराबर नहीं खड़ा है। स्टार्ट ट्रीटी से अलग होने के बाद विध्वंसक हथियारों से जुड़ी दूसरी घोषणा की है। 

विध्वंसक हथियारों की तैनाती:

आस्ट्रिया की राजधानी विएना में 57 देश सदस्यीय देशों की आर्गनाइजेशन फार सिक्युरिटी एंड कोओपरेशन इन यूरोप (ओएससीई) की बैठक हो रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध से पैदा हुए तनाव के बीच यूरोपीय देशों और रूस के सांसद-अधिकारी साथ बैठे हैं। आस्ट्रिया ने विरोध की परवाह न करते हुए रूस को बैठक में आमंत्रित किया है। लेकिन इसमें यूक्रेन का दल बैठक में नहीं आया है। इसे रूसी उपस्थित का यूक्रेनी विरोध माना जा रहा है। रूस की उपस्थिति का विरोध करने वालों में ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा जैसे प्रभावशाली देश हैं। यह संगठन शीतयुद्ध काल के दौरान पूर्व और पश्चिम के देशों में वार्ता के लिए बनाया गया था। यह संगठन शांति, मानवाधिकार, शस्त्र नियंत्रण और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा करता है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के अप्रत्याशित यूक्रेन दौरे और उसके बाद पोलैंड में नाटो देशों के नेताओं के साथ बैठक से इससे स्पष्ट है कि 2023 में लड़ाई बढ़ने वाली है। पुतिन ने कहा, हम एक अन्य हाइपरसोनिक मिसाइल किंझल का उत्पादन भी बढ़ा रहे हैं। साथ ही समुद्र में जिरकोन हाइपरसोनिक मिसाइल की तैनाती बढ़ा रहे हैं। यह मिसाइल युद्धपोत और पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली मिसाइल है। ये सभी मिसाइलें परमाणु हमला करने में सक्षम हैं।

Friday, 27 May 2022

दुनिया में बढ़ता धार्मिक उन्माद




 उदय सिंह

एक अंतरिक्ष यान है वोयेजर वन, यह इंसानों द्वारा निर्मित ऐसी वस्तु है जो हम से इतनी दूर जा चुका है कि जहां से पृथ्वी को देख पाना भी संभव नहीं है। कुछ वर्ष पहले इसकी तस्वीर प्रकाशित हुई थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि वोयेजर वन हमारे सौर मंडल से दूर लगभग 21 अरब किलोमीटर दूर जा चुका है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि दूसरी दुनिया और आकाशगंगाओं का छोर नापने को आतुर इंसान आज भी धार्मिक विवादों से मुक्त नहीं हो सका है। धर्म शांति का संदेश देते हैं, लेकिन पाकिस्तान, कंबोडिया, भारत, थाईलैंड, ईरान और तिब्बत समेत दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां आज भी धार्मिक स्थल विवादित हैं। यरूशलम सदियों से आकर्षण और चर्चा का मुख्य केंद्र रहा है। यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों की यह पवित्र नगरी है। ईसा मसीह की कर्मभूमि रही है तो हजरत मुहम्मद यहीं से जन्नत गए थे। अल-अक्सा मस्जिद यहीं है। इसी मस्जिद से इस्लाम धर्म की उत्पत्ति मानी जाती है। इसके लिए सात बार युद्ध हो चुका है जिसे धर्मयुद्ध (क्रूसेड) कहा जाता है। 

धार्मिक युद्ध का खतरा :

यरूशलम के अल-अक्सा मस्जिद परिसर में प्रार्थना की कोशिश करने वाले तीन यहूदियों के पक्ष में कोर्ट द्वारा फैसला सुनाने के बाद यहां फिर धार्मिक युद्ध का खतरा मंडरा रहा है। यहूदी इस स्थल को दो प्राचीन मंदिरों के अवशेष के रूप में पूजते हैं, लेकिन मुस्लिमों के साथ एक समझौते के तहत उन्हें वहां पूजा करने से रोक दिया गया था। इजराइल का दावा है कि पूरा यरुशलम उसकी राजधानी है, जबकि फिलस्तीन का कहना है कि यरुशलम उसका है। फिलस्तीनी इसे राष्ट्र की राजधानी मानते हैं। अतीत में जाएं तो मालूम होगा कि ईसाइयों ने 1095 और 1291 के दौरान अपने धर्म की पवित्र भूमि यरुशलम में स्थित ईसा की समाधि का गिरजाघर मुसलमानों से छीनने के प्रयास में जो युद्ध किए थे, इसी को सलीबी युद्ध, ईसाई धर्मयुद्ध या क्रूसेड युद्ध कहा जाता है। 1948 में भी अरब-इजरायल युद्ध हुआ। यहूदी धर्म का इतिहास लगभग 4000 साल पुराना है। यहूदियों का मानना है कि यहीं इब्राहिम ने अपने बेटे इसाक की कुर्बानी दी थी। यहीं से विश्व की उत्पत्ति हुई। पूरी दुनिया में केवल इजराइल ही यहूदी बाहुल्य देश है। 

प्रह्लादपुरी मंदिर का विवाद : 

भारत में भी कई धार्मिक स्थलों पर विवाद है। हिंदू धर्म से अलग हुए बौद्ध और जैन से तो कोई खास अनबन नहीं है लेकिन बाहरी मुल्क से तुर्कों और मुगलों के आगमन के बाद मंदिर-मस्जिद विवाद अधिक बढ़ गया। मंदिर के निर्माण की शुरुआत कब से इसे ठीक जानकारी के लिए कोई अधिकृत स्रोत नहीं मिलते लेकिन मोटे मौत पर गुप्तकाल में चौथी से छठी शताब्दी के दौरान मंदिरों के निर्माण का उल्लेख मिलता है। पहले लकड़ी से मंदिर का स्वरूप बनते थे बाद में पत्थर और ईंट से मंदिर बनाए जाने लगे। भारत में तुर्कों के आगमन के बाद ही मंदिरों को ध्वस्त किये जाने की शुरुआत हुई। इससे पूर्व मंदिरों तो तोड़े जाने का प्रमाण शायद नहीं हैं। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुल्तान शहर में भी प्रह्लादपुरी मंदिर विवादों में है। कहा जाता है कि इसे असुरों के राजा हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने बनवाया था, जो हिंदू देवता नरसिंह को समर्पित है। 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद पाकिस्तान में मुस्लिमों ने प्रह्लादपुरी मंदिर को भी ढहा दिया। 

आगरा, दिल्ली और बनारस :

विश्व प्रसिद्ध आगरा का ताज महल भी आपनी नायाब खूबसूरती के साथ विवादों से घिरा है। मुस्लिमों का मानना है कि 17वीं सदी में मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी के लिए प्यार की निशानी के रूप में यह मकबरा बनवाया था। हिंदुओं का कहना है कि ताजमहल शिव मंदिर था, जिसे शाहजहां ने तोड़कर बनवाया था। इसको लेकर 2015 में आगरा कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की गई थी। वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद फिलहाल गर्म है। हिंदुओं का कहना है कि मस्जिद के बीच शिवलिंग मिला है, इसे औरंगजेब ने तोड़वाकर मस्जिद बनवाया था। राजधानी नई दिल्ली स्थित कुतुबमीनार भी इन दिनों विवादों में घिर गया है। इतिहास में लिखा है इसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था, जबकि हिंदुओं का कहना है कि यह विष्णु स्तंभ है।

ईरान का पारसी सूर्य मंदिर:

 ईरान के तारिखानेह मंदिर-मस्जिद के विवाद से कौन परिचित नहीं होगा। इसे ईरान का सबसे प्राचीन मस्जिद कहा जाता है। यह पारसी सूर्य मंदिर अल्पसंख्यकों का धार्मिक स्थल था लेकिन 8वीं सदी में इसे तोड़कर मस्जिद बना दिया गया। कंबोडिया-थाईलैंड में प्राचीन प्रीह विहार मंदिर भी विवादों में है यह दोनों देशों की सरहद पर स्थित है। इस पर दोनों अपना अधिकार जताते हैं। कई बार लड़ाई हो चुकी है। तिब्बत के ल्हासा में स्थित पोटाला पैलेस चीन के कब्जे है। चीन ने इस स्थल पर पैसा लगाकर संग्रहालय में तब्दील कर दिया। अब यहां दर्शन के लिए तीर्थयात्रियों को अनेक परेशानियों से जूझना पड़ता है।

अमेरिका में बढ़ती कट्टरता:

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका में भी इन दिनों छद्म राष्ट्रवाद को लेकर समाज में कट्टरता का समावेश होता जा रहा है। ईसाई धर्म की श्रेष्ठता साबित करने के लिए पिछले कुछ सालों में अंध-कट्टरवाद और धार्मिक हिंसा की कई घटनाएं घटित हुई हैं। सबसे उपेक्षित अफ्रीका महाद्वीप में ऐसी घटनाएं अपेक्षाकृत कम हैं लेकिन सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक देश में मुस्लिम आबादी को पिछले कई सालों से खदेड़ा जा रहा है। उनके घर, खिड़की दरवाजे के साथ हर चीज को नष्ट किया जा रहा है। हिंसा की वजह से विवश होकर हजारों मुस्लिम परिवार देश छोड़कर कैमरून और चाड में शरण लिये हैं।

Saturday, 14 May 2022

अयोध्या की राह चला ज्ञानवापी मस्जिद विवाद


उदय सिंह

बनारस एक बार फिर सुर्खियोंं में है। इस बार मामला लगभग 350 साल पुराना ज्ञानवापी मस्जिद विवाद का है। इसका निर्माण बनारस के मशहूर ब्राह्मण परिवार ने कराया था। मूलत: यह एक


विश्वेश्वर मंदिर था। 16वीं सदी में बादशाह जहांगीर के सहयोगी वीर सिंह देव बुंदेला इसके संरक्षक थे। सत्रहवीं सदी में मंदिर के कुछ हिस्से का नवीनीकरण किया गया। ऐसा भी कहा जाता है कि 1669 में मुगल शासक औरंगजेब के आदेश पर मंदिर का विध्वंस कर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया, जो भी हो मामला 31 साल से कोर्ट में है। गौर से देखें तो काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का मामला कमोवेश अयोध्या विवाद जैसा ही रुख अख्तियार कर रहा है। हालांकि अयोध्या मामले में मस्जिद थी और इसमें मंदिर-मस्जिद दोनों हैं।

विवाद की शुरुआत कुछ इस तरह से हुई। पिछले साल बनारस की पांच महिलाओं ने लोकल कोर्ट में एक वाद दायर कर ज्ञानवापी मस्जिद परिसर स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा करने की इजाजत और सर्वे कराने की मांग की। कोर्ट ने सर्वे की इजाजत भी दे दी। कोर्ट के आदेश पर सर्वे हो चुका है। हिंदुओं का कहना है ज्ञानवापी में 1991 से पूर्व की स्थिति कायम हो और परिसर को नियमित दर्शन-पूजन के लिए सौंपा जाए। हिंदू पक्ष के मुताबिक 1669 में औरंगजेब ने यहां काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई थी। मुस्लिम पक्ष अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी इस बात से इनकार करता है। उनका कहना है कि यहां मंदिर नहीं था। मामले में हिंदू पक्ष की तीन प्रमुख मांगे हैं। पहली मांग है कि कोर्ट ज्ञानवापी परिसर को काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर का हिस्सा घोषित करे। दूसरी मांग मस्जिद ढहाने और मुस्लिमों के यहां आने पर प्रतिबंध लगे। और तीसरी मांग यहां पर मंदिर के पुरर्निर्माण की अनुमति है।  

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 21 अप्रैल को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने के सिविल जज वाराणसी के आदेश को चुनौती देने वाली अंजुमन इंतजामिया मस्जिद की याचिका खारिज कर दी थी। मस्जिद में सर्वे का मामला अब सर्वोच्च न्यायालय पहुंच चुका है। मस्जिद कमेटी ने शीर्ष कोर्ट में याचिका दाखिल कर उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी है। मस्जिद कमेटी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मामले पर जल्दी सुनवाई मांगी गई थी। कोर्ट से यथास्थिति कायम रखने का आदेश देने का आग्रह किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आदेश देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह पहले केस की फाइल देखेगा।  

आठ अप्रैल 2022 को मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता अजय कुमार मिश्र को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया। जिसे विपक्षी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कमीशन कार्यवाही रोकने की गुहार लगाई। हाईकोर्ट ने 12 मई 2022 को याचिका खारिज कर एडवोकेट कमिश्नर बदलने की मांग को ठुकरा दिया और पांच दिनों में रिपोर्ट सौंपने को कहा है। 1991 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने एक कानून पारित किया था सेस ऑफ वरशिप एक्ट। इसके मुताबिक 15 अगस्त 1947 में जो धार्मिक स्थल जिस रूप में थे, वह उसी रूप में रहेंगे। उसके साथ छेड़छाड़ या बदलाव नहीं किया जा सकता।


Monday, 11 April 2022

कछुओं की अंधाधुंध तस्करी

 उदय सिंह

कच्छप!! यानी कछुआ, इसे कूर्म भी कहते हैं। शुभ और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक रूप से महत्पवूर्ण जीव है। अठारह मुख्य पुराणों मेें कूर्मपुराण एक है। भगवान विष्णु के दसावतारों में द्वितीय कूर्मावतार है। इसमें कूर्मरूपधारी विष्णु ने महर्षियों को पुरुषार्थचतुष्टय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का महात्म्य सुनाया था। लेकिन मैं यहां ऐसा कुछ नहीं सुना रहा हूं, मेरी काबिलियत का स्तर बहुत ही सामान्य है। मेरी चिंता सिर्फ कछुओं की विलुप्त होती प्रजातियों की है। जिस देश में कछुओं का इतना महत्व हो, वहां उनकी ऐसी दुर्दशा सोचनीय है। दुनिया में कछुओं की लगभग 260 प्रजातियां हैं। जानकारों का मानना है कि प्राकृतिक रूप से सम्पन्न भारत में भी कछुओं की करीब 28 प्रजातियां पाई जाती हैं। उत्तर प्रदेश में भी 14 प्रजातियां अपनी दयनीय हालत में मिल जाती हैं। कहते हैं कछुए 300 वर्षों तक जीवित रह सकते हैं, और 500 किलो तक इनका वजन हो सकता है, लेकिन तस्करों की वजह से ऐसा शायद ही संभव होता हो।

हमारे गांव में एक सागर (चारों ओर पहाड़ी नुमा भीटे से घिरा बड़ा तालाब) है। सुलतानपुर की दियरा रियासत के राजा साहब ने सैकड़ों साल पहले इसे खुदवाया था। यह जड़ी-बूटी के साथ साही और अजगर जैसे वन्य जीवों से भरपूर है। सागर की अथाह गहराई की तरह किंवदंतियां भी अनेक हैं। बचपन में हमें बताया जाए कि यह भूत पिशाच और आसुरी शक्तियों का ठिकाना है, बावजूद इसके हम पूरा दिन उसी सागर के इर्द गिर्द मंडराते फिरते। हालांकि बड़े होने पर भूतों की भ्रांतियां समाप्त हो गईं। आसपास के दर्जनों गांवों के मवेशियों की प्यास इसी सागर में बुझती थी। उसका निर्मल पानी आकाश जैसा नीला था। गर्मियों में हम बच्चे इसमें तब तक नहाते जब तक थक न जाएं। इसके अंदर बड़े-बड़े कछुए और आदम कद मछलियां कौतूहल का विषय थीं। फिर एक दिन राजा साहब की बहू रानी शिकार पर निकलीं। सागर में जहर डलवा दिया। व्याकुल होकर मछलियां ऊपर आने लगीं और पूरे सागर में पट गया। लेकिन जहर का असर कछुओं पर नहीं पड़ा, इस लिए इसमें एक बड़ा जाल फेंकवाया गया। मछलियों के साथ दो से तीन क्विंटल वजन के सैकड़ों कछुओं को भी पकड़ा गया। ट्रक में भरकर कहीं भेज दिये गए। यह सिलसिला जारी रहा, लेकिन कछुओं को बचाने कोई नहीं आया। 

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 तहत कछुओं को कब्जे रखना या मारना आपराधिक दायरे में आता है, फिर भी 18 नाखून, 20 और 21 नाखून वाले कछुओं की खूब तस्करी होती है। कहते हैं 16 नाखून वाला कछुआ काफी महंगा होता है। दुनिया में भारतीय कछुओं को सबसे खूबसूरत माना जाता है। इनकी नरम और कड़ी परत के आधार पर कीमतें तय की जाती है। तंत्र विद्या से जुड़े लोगों का मानना है कि नरम परत वाले कछुओं को रखने से धन वर्षा होती है। यह गोरखधंधा न जाने कब से जारी है, लेकिन इनकी रोकथाम के लिए कोई पर्याप्त प्रबंध नहीं किया। इस जीव के संरक्षण के लिए 23 मई को विश्व कूर्म (कछुआ) दिवस भी मनाया जाता है। भारत में सिर्फ ओडिशा में एकमात्र कछुआ संरक्षण परियोजना है, जो भीतरकनिका नाम से मशहूर है। जिसकी शुरुआत 1989 में हुई थी। वाराणसी में गंगा एक्शन प्लान के तहत कछुआ सेंचुरी स्थापित की गई, लेकिन एक दशक में हजारों कछुए यहां से गायब हो चुके हैं। पूरे देश में धड़ल्ले से कछुए की तस्करी होती है। अफसोस है कि कछुओं की 28 प्रजातियों में हम 17 प्रजातियां खत्म कर चुके हैं।

Wednesday, 6 April 2022

विश्व में नया शक्ति संतुलन


 उदय सिंह

एक कहावत है, आस पराई जो तके जीवित ही मर जाए। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की का हाल भी कुछ ऐसा ही है। इधर के रहे न उधर के। नाटो के चक्कर में पूरे यूक्रेन को खंडहर बना दिए। लेकिन कई मायनों में यूक्रेन-रूस युद्ध ने दुनिया को बड़ा संदेश दिया है। इसकी वजह से विश्व शक्ति संतुलन नया आकार ले रहा है। जैसे शक्तिशाली जर्मन साम्राज्य स्थापित करने के लिए ओटो फॉन बिस्मार्क ने 19वीं सदी में फ्रांस, इंग्लैंड और ऑस्ट्रिया से शक्ति संतुलन का सिद्धांत अपनाया था, कुछ वैसे ही समीकरण की आकृति 21वीं सदी में एशिया में बनती दिख रही है। अपने सतही मुद्दों को फिलहाल ठंडे बस्ते में डालकर भारत, रूस और चीन करीब होते दिख रहे हैं। रूस से रिश्ते तोड़ने को लेकर भारत पर यूरोपीय देशों और अमेरिका की ओर से काफी दबाव बनाया जा रहा है, बावजूद इसके भारत अपनी राय और फैसले पर अडिग है, लेकिन भविष्य में भारत पर यह दबाव और बढ़ेगा। रणनीति यह है कि रूस को जी-20 की बैठक से बाहर करने में भारत पहल करे, क्योंकि 2023 में जी-20 की बैठक भारत में होगी।

परिणाम भुगतने की चेतावनी:

अमेरिका के उप राष्ट्रीय सलाहकार दलीप सिंह ने अभी हाल ही में कहा कि रूस पर लगाए प्रतिबंधों का पालन जो देश नहीं कर रहे हैैं, उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। इस लिए भारत को रूस से ज्यादा ईंधन खरीदने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यह भी कहा कि यदि चीन ने एलएसी को पार किया तो रूस मदद नहीं करेगा। उनके बयान के बाद रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत की यात्रा पर पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात किए। काबिले गौर यह है कि पिछले लगभग दो सप्ताह में ब्रिटेन, ग्रीस, मैक्सिको व आस्ट्रिया समेत कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष, मंत्री और विदेश सचिव भारत दौर पर आए, प्रधानमंत्री मोदी को किसी से मिलने की फुर्सत नहीं मिली, लेकिन रूस के विदेश मंत्री से मुलाकात करने लिए वह समय निकाल लिये। यूक्रेन के हालात और द्विपक्षीय रिश्तों के साथ तमाम महत्वपूर्ण बिंदुओं पर वार्तालाप हुई। रूस भारत को अधिक से अधिक ईंधन बेचने को तैयार है, और भारत खरीदने को रज़ामंद है।

भारत का बढ़ता महत्व:

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत आने से पहले चीन भी गए थे। चीन के विदेश मंत्री वांग यी अघोषित यात्रा पर भारत आये और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बातचीत की। दोनों देश एक-दूसरे के लिए खतरा न बनने और मतभेदों को दूर करने पर सहमत हुए हैं। एक जमाने में माओ त्से-तुंग ने भी भारत के महत्व को स्वीकार किया था। उनका नारा था कि दोनों देशों को साथ-साथ खड़े हो जाना चाहिए, वे विश्व में महत्वपूर्ण तत्व होंगे। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का यह कहना कि भारत रूस-यूक्रेन शांति स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकता है, यह बयान अमेरिका और पश्चिमी देशों को मुंह चिढ़ाने वाला है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी के जाने के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात किए। इसके बाद वाराणसी में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन किया।  

शक्तिहीन संयुक्त राष्ट्र:

रूस की प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े ग्राहक यूरोपीय देश ही हैं। यदि रूस गैस आपूर्ति रोक देता तो अफरातफरी मच जाएगी। शायद यही कारण है कि अमेरिका यूरोप के लिए पेट्रोलियम का अब तक का सबसे बड़ा भंडार खोल दिया है। पश्चिमी देश ईंधन के मामले में काफी हद तक रूस पर निर्भर हैं। भारत यात्रा पर आए जर्मनी के विदेश नीति सलाहकार जेंस प्लोटनर ने कहा कि यूक्रेन के खिलाफ जारी रूसी आक्रमण रुका नहीं तो इसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैैं। उधर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की अमेरिका और पश्चिमी देशों से मदद की भीख मांग रहे हैं। अमेरिका के आगे दुम हिलाने वाले संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस भारत, चीन और इजरायल के साथ कई देशों से रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने का रोना रो रहे हैं। 

पुराना हुआ निर्गुट का चोला:  

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत नीतियां अलग थीं। तब वह निर्गुट संगठन में शामिल हुआ। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गुट निरपेक्षता और उसके संगठन का स्वरूप दिया। उनका मानना था कि एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र और गरीब देशों को बड़ी महाशक्तियों के गुटों से फायदे के बजाय नुकसान ही होगा। इसलिए वह मोहरा नहीं बनेंगे। गुटनिरपेक्षता का अर्थ था, हर मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से सही या गलत की स्वयं पहचान करना। इसकी स्थापना 1961 में हुई थी। अब तक इसके 120 सदस्य अधिक हो चुके हैं। इसके सदस्य देशों ने तय किया था कि विश्व दोनों ध्रुवों का साथ या विरोध में नहीं रहेंगे। हालांकि भारत शुरू से ही सोवियत संघ से सैन्य हथियारों को खरीदता रहा है। भारत की सोवियत संघ के साथ 1963 में महत्वपूर्ण हथियार संधि की शुरुआत हुई। 1964 और 1965 में तीन संधियों पर हस्ताक्षर किए गए। ऐसे में सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बन गया। दोनों के संबंध नई मंजिल पर पहुंच गए। आज भारत रूस से सर्वाधिक हथियार मंगा रहा है।

Saturday, 26 March 2022

क्षीर्ण होता अमेरिकी वर्चस्व


 उदय सिंह

यूक्रेन और रूस के बीच लगभग एक महीने से युद्ध जारी है। बमबारी में यूक्रेन के 95 फीसद शहर बर्बाद होकर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। बिजली, पानी और बुनियादी जरूरतों के लिए डवडबाई आंखों से यूक्रेन के नागरिक पड़ोसी मुल्कों को ताक रहें। हाहाकार जैसी स्थिति है। सड़कों व इमारतों की संगमरमरी चिकनाहट बीहड़ जैसी हो गई है। दिन-रात मिसाइलों की चिर्राहट से यूरोपीय के देशों की नींद काफूर  हो चुकी है। अब आहिस्ता-आहिस्ता छिपकलियों की तरह रेंगते हुए रूसी सैनिक राजधानी कीव पर कब्जा करने को आतुर हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की गीली आंखों से अमेरिका और नाटो सदस्यों देशों से मदद की याचना करने लगे हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने वैश्विक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। उनके के हौंसले बुलंद हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने कहा है कि यदि रूस यूक्रेन में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करता है तो नाटो जवाब देगा। लेकिन यह जवाब कैसा होगा यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है, कम से कम सैन्य मदद तो नहीं है। 

यूरोपीय देशों का खोखलापन उजागर:

1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद जो स्थिति थी वैसे हालात अब रूस के नहीं हैं। वह समृद्ध और शक्तिशाली हो चुका है। गौर करें तो सारी खुराफात की जड़ अतीत में हीहै। 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद अतिमहत्वाकांक्षा कुछ देश मुंह फुलाए असंतुष्ट थे। लिहाजा यूरोप में पूर्वी और पश्चिमी दो धड़ों की लकीर खिंच गई। अमेरिका पश्चिमी यूरोप की अगुवाई कर रहा था तो सोवियत संघ पूर्वी हिस्से का। इसी दरम्यान अमेरिकी नेतृत्व में साम्यवादी सोवियत संघ के प्रसार रोकने के लिए 4 अप्रैल 1949 को 12 देशों को शामिल करते हुए उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की स्थापना हुई। इसका मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ की गतिविधियों पर नजर रखना था। जवाब में सोवियत संघ ने भी पूर्वी यूरोप को मिलाकर 1955 में वारसा संधि स्थापित कर ली, ताकि वह नाटो का मुकाबला कर सके। करीब 45 वर्षों तक दोनों गुटों में तनातनी होती रही, हालांकि लड़ाई कभी नहीं हुई। इसी दौर को हम शीतयुद्ध कहते हैं। 26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ का विघटन हो गया और राष्ट्रपति गोर्बाचेव ने वारसा संधि को खत्म कर दिया, लेकिन अमेरिकी नेतृत्व का नाटो समाप्त नहीं किया गया, बल्कि उसका विस्तार जारी रहा। आज नाटो में 30 देश शामिल हो चुक हैं। यूक्रेन भी नाटो में शामिल होना है, जिसका रूस ने विरोध किया लेकिन यूक्रेन ने उसे नजरअंदाज कर दिया। अब कोई यूरोपीय देश भी इस युद्ध में खुलेतौर पर सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहें हैं।

अमेरिका का मोहरा बना यूक्रेन: 

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के
अनवरत विस्तार पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लगातार विरोध करते रहे हैं। उनकी बातों को कभी संजीदगी से नहीं लिया गया। अब यूक्रेन के नाटो में शामिल होने की बात पर रूस ने चेतावनी दी थी कि यदि वह उसमें शामिल हुआ तो उसको खामियाजा भुगतना पड़ेगा। यूक्रेन ने जिद नहीं छोड़ी, लिहाजा रूस ने उस पर हमला कर दिया। खैर युद्ध जारी है। अमेरिका ने कहा था कि वह सीधे तौर पर युद्ध में शामिल नहीं होगा, और ना ही नाटो शामिल होगा, लेकिन अब बयान बदल गए हैं। अमेरिका और यूरोपीय देश रूस पर अनेक प्रतिबंध लगा चुके हैं। पूरी कोशिश है कि उसे दुनिया से अलग थलग कर दिया जाए। यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर बेल्जियम के सबसे बड़े शहर राजधानी ब्रसेल्स में नाटो, सात औद्योगिक देशों के समूह और 27 सदस्यीय यूरोपीय परिषद ने आपातकालीन बैठक की। जहां अमेरिका के साथ पश्चिमी देशों के नेताओं ने रूसी आक्रमण के खिलाफ एक एकजुट दिखे। इसे अभूतपूर्व बताया जा रह है। 

भारत का कूटनीतिक हथियार :

यूक्रेन रूस के बीच युद्ध में सबसे अधिक दबाव भारत पर है कि वह किधर है अमेरिका की ओर या फिर रूस के साथ, लेकिन भारत कूटनीतिक रुख अख्तियार किया है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के लाख दबाव के बावजूद वह उनके झांसे में नहीं आ रही है। भारत, रूसी हथियारों का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है। रूसी निर्मित लड़ाकू जेट, पनडुब्बियां,  और न जाने कितने टैंकों का संचालन करता है। लगभग 10 अरब डॉलर मूल्य के हथियार अब भी रूस से मंगा रहा है। इनमें परमाणु पनडुब्बी और एस-400 शामिल हैं। 2021-22 के लिए भारत का संपूर्ण रक्षा बजट 70 अरब डॉलर है। कुछ दिन पहले दिल्ली में पीएम मोदी से जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा की मुलाकात हुई, फुमियो किशिदा ने अमेरिका की तरफदारी करते हुए लोकतंत्रों के सहयोग का आह्वान किया। जबकि मोदी ने उनके केवल आर्थिक मुद्दों पर बात की। पीएम नरेंद्र मोदी के साथ दूसरे वर्चुअल शिखर बैठक में आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्काट मारिसन ने भी यूक्रेन पर हमले के लिए रूस को जिम्मेदार ठहराया। भारत की ओर सिर्फ आर्थिक मुद्दों पर ही चर्चा हुई। 

अमेरिकी वर्चस्व और नाटो के अस्तित्व पर खतरा:

एक महीने से रूस यूक्रेन पर कहर बरपा रहा है। अमेरिका और नाटो सदस्य देश तमाशाबीन बने हैं। देखा जाए तो यह कितना हास्यास्पद है कि जिस नाटो में शामिल होने के लिए यूकेन रूस से दुश्मनी मोल लिया वह जब अब तक उसके लिए कुछ भी नहीं कर सका। अमेरिका विश्व बिरादरी से रूस को अलग करना चाहता है कि लेकिन देखा जाए तो नाटो के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा है। जब वह अपने दोस्त की मदद नहीं कर सकता तो तो उसका क्या औचित्य। अब चर्चा है कि पुतिन पर नूरमबर्ग अदालत की तरह ही मामला चलाया जाएगा। इसके लिए विश्व 140 से अधिक नेताओं और अन्य लोगों ने  याचिका पर हस्ताक्षर किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नाजी युद्ध अपराधियों की जांच के लिए गठित नूरमबर्ग अदालत बनाई गई थी। शायद अमेरिका सबसे बड़ा कष्ट यह है कि दुनिया पर उसका वर्चस्व मुट्ठी में फिसलती रेत जैसा है।

Saturday, 12 March 2022

सत्याग्रह और राजनीति का "नमक"


 उदय सिंह


मरहम के नहीं हैं ये तरफ़-दार नमक के 

निकले हैं मिरे ज़ख्म तलबगार नमक के, 

आया कोई सैलाब कहानी में अचानक 

घुल गए पानी में वो किरदार नमक के। 

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले "द पंजाबी तड़का" के मशहूर शेफ हैं, हरपाल सिंह सोखी। उनका एक तकिया कलाम है नमक शमक, नमक शमक डाल देते हैं...। व्यंजन में नमक का महत्व जिस सलीके बताते हैं वह काबिले तारीफ है। देश की आजादी से पहले से ही नमक अपनी अहमियत के लिए समय समय पर चर्चा में रहा है। भोजन के अलाव वास्तुशास्त्र में भी नमक को उपयोगी माना गया है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी नमक पड़ गया, और चुनाव का जायका दिया। आज ही दिन ठीक 92 वर्ष पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह की शुरुआत कर अंग्रेजों के बनाए नमक कानून को तोड़ा था। जिसे हम लोग दांडी मार्च कहते हैं। अभी दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव संपन्न हुआ है। इस चुनाव में भी सबसे अधिक नमक खाने की चर्चा रही। चुनाव प्रचार के वक्त यूपी के मैनपुरी में एक वृद्ध महिला का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह बुजुर्ग महिला कृतघ्नता जाहिर करते हुए बोल रही थी कि मैंने प्रधानमंत्री मोदी का नमक खाया है, धोखा नहीं देंगे। आखिर नमक ने अपना असर दिखा दिया। योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे।

मां विंध्यवासिनी जीवनभर चुकाएंगे नमक का कर्ज:

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नमक का सहारा लिया। कहा, मां विंध्यवासिनी आपने हमारा नमक नहीं खाया है। नमक तो हमने आपका खाया है। उस नमक का जीवनभर कर्ज चुकाता रहूंगा। 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से 24 दिनों में 390 किलोमीटर पैदल यात्रा कर दांडी पहुंचते हैं और मुट्ठी भर नमक उठाकर अंग्रेजों के बनाए नमक कानून को तोड़ दिया। नमक सत्याग्रह महात्मा गांधी के अहिंसक विरोध के सिद्धांतों पर आधारित था, इसे सत्याग्रह कहा जाता है। अंग्रेजी हुकूमत ने भारतीयों को नमक बनाने का अधिकार नहीं था। दरअसल, वर्ष 1882 नमक अधिनियम के तहत नमक संग्रह के साथ निर्माण पर अंग्रेजों का एकाधिकार हो गया। इसके जरिये नमक बेचने पर भी उन्हीं का अधिकार था। इंग्लैंड से आने वाले महंगे नमक का ही इस्तेमाल भारतीयों को करना पड़ता था, ताकि ब्रिटेन के व्यापारी मालामाल हो सकें। 

कोरोना काल में नमक के भाव आसमान पर,:

देश को आजादी मिले 75 साल हो गए, लेकिन आज भी नमक अपनी कीमतों को लेकर बहस-मुबाहिसा में बना रहता है। गांधी के नमक सत्याग्रह से अमेरिका के अश्वेत आंदोलनकारी मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन यहां नेता और व्यापारी नहीं। कोरोना काल में कई प्रदेशों के सुदूर इलाकों में लोगों को 130 रुपये किलो नमक खरीदना पड़ा। यह विदेशी व्यापारी नहीं भारतीय हैं जो नमक बेच कर मनमाना मुनाफा कमाते हैं। सात आठ साल पहले की बात है, बिहार में 100 से 150 रुपये किलो तक नमक बेचा गया, हालांकि सरकार की ओर से इसे अफवाह करार दिया गया। आज नमक सत्याग्रह पर जगह-जगह गोष्ठियां हो रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने आज गुजरात से ट्वीट किया कि आज के ही दिन इसी धरती से दांडी यात्रा की शुरुआत हुई थी। जब गांधीजी ने अंग्रेजी हुकूमत को भारतीयों के सामथ्र्य का एहसास कराया था। काश, इस सामथ्र्य को वह भारतीय व्यापारियों को भी समझा सकते।

Thursday, 10 March 2022

राजनीति की "माया"


उदय सिंह

चुनाव में हार जीत ही होती है। एक हारता है तो दूसरा दल जीतता है। इसमें अचरज जैसी बात नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में एक नई और "खास बात" है, बहुजन समाज पार्टी का समाप्त होना। बसपा खत्म होने की कगार है। देशभर में इसके समर्थक इन दिनों असमंजस और दुविधा में हैं, कि कहां जाएं। फिलहाल पंजाब में आम आदमी पार्टी तो उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है, जिसका परिणाम दोनों राज्यों में देखने को मिला है। लेकिन यह स्थायी है कि नहीं, यह तो समय ही बताएगा। बसपा दलित वोटों के आधार पर एक खास वर्ग की बहुत बड़ी संख्या का प्रतिनिधित्व करती है। पार्टी का अस्तित्व खत्म होने से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने वोटों को भाजपा के शिफ्ट कर दिया। उन्होंने अपने मतदाताओं से स्पष्ट कह दिया था कि वह भाजपा को वोट करें। अपने राजनीतिक जीवन में बसपा का कोई उत्तराधिकारी भी नहीं तैयार नहीं होने दिया। अंत में पूरा जनाधार उन्हीं को सौंप दिया जिसे वह धुर विरोधी और मनुवादी कहती थी। ऐसा उन्होंने क्यों किया इसमें उन्हीं का व्यक्तिगत लाभ और स्वार्थ निहित है। तो क्या अब यह मान लिया जाए कि मायावती राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठना चाहती हैं। दलितों में विश्वास पैदा करने के लिए भाजपा रामनाथ कोविन्द को राष्ट्रपति बनाया था। 

समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ भारत रत्न भीमराव रामजी अम्बेडकर के जन्मदिन पर 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना हुई। संस्थापक थे पंजाब के रोपड़ जिले में 15 मार्च 1934 पैदा हुए कांशी राम थे। कांशी राम ने देश में बिखरे दलित वोटों को संगठित करने का अथक प्रयास किया, जिसका पूरा लाभ मायावती को मिला। वह एक सशक्त राजनीतिज्ञ के तौर पर उभरीं और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं। वह सनातन हिंदू विचारधारा के खिलाफ दलितों को साधने में कामयाब रहीं। उनके भाषणों में मनुवाद और मनुवादी हमेशा निशाने पर रहते। शायद इसी लिए बुद्धिज्म में उनकी आस्था ज्यादा थी। यही कारण रहा कि पिछड़ी जातियों के लोगों में भी बुद्धिज्म का अंकुरण फूटा और बड़ी संख्या में बौद्ध हो गए। 

बाबा साहेब अम्बेडकर बंधुत्व की भावना और समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे। इसके जरिये ही आदर्श समाज बनाना चाहते थे। हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और छुआछूत से आजिज होकर 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। उनकी कल्पना आधुनिक, वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत विचारों वाले देश की थी। अछूतों से सामाजिक भेदभाव से बहुत क्षुब्ध थे, इसके खिलाफ अभियान चलाया था और दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया। देवताओं के संजाल को तोड़कर एक ऐसे मुक्त मनुष्य की कल्पना कर रहे थे जो धार्मिक होने के साथ जीवन मूल्यों के महत्व को समझे। उनका कहना था कि किसी देश का यदि राजनीतिक लोकतंत्र मजबूत करना है तो उसके लिए संसदीय लोकतंत्र की मजबूती पर ध्यान देना होगा। उनकी इसी विचारधारा को दलित नेता के मसीहा कहे जाने कांशी राम और मायावती जमीन से जोड़कर आगे ले गये। 

 भारतीय जनता पार्टी से अंदर ही अंदर समझौता होने के कारण ही इस बार मायावती विधानसभा चुनाव में बहुत ही सक्रिय नहीं दिखीं। हो सकता है सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को इसकी भनक लगी हो लेकिन वह दलित वोटरों को हथिया नहीं सके। उनके लिए आने वाला समय और चुनौतीपूर्ण होगा। 2027 के विधानसभा चुनाव में बहुत तेजी से शीर्ष की ओर बढ़ रही आम आदमी पार्टी से उन्हें जूझना पड़ेगा। जिसने पहले दिल्ली और अब पंजाब हो फतह कर लिया है। पहले उनके साथ नेताजी मुलायम सिंह का बनाया जनाधार जुड़ा था, लेकिन अगले चुनाव में नेताजी का असर काफी कम हो चुका होगा। जनता आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प के तौर पर देख रही है।

Wednesday, 23 February 2022

घूंघटे में चंदा है,हिजाब पर हंगामा


उदय सिंह

चन्द्रगत भारती की एक कविता है।

अंधेरों की हुकूमत में

अभी तक जी रहा था मैं,

हटाया चांद ने घूंघट तो

उजाला हो गया घर में।

और वफ़ा बराही का एक शेर है।

रुख़-ए-आरज़ू पर हिजाब-ए-मोहब्बत

खिला और इस से शबाब-ए-मोहब्बत।

सिवा यास के मैं ने देखा न कुछ भी

उठाई जब उस ने नक़ाब-ए-मोहब्बत।

घूंघट और हिजाब की शान में ऐसे ही हजारों कविताएं, शेर और गीत लिखे गए हैं, जिसे महिलाओं के लिए अनुशासन और सम्मान का प्रतीक माना गया है। इन दिनों हिजाब पर हंगामा बरपा है। हिजाब पहना सही है या गलत यह विमर्श का विषय है। व्यक्तिगत तौर पर मैं इसके खिलाफ हूँ। आमतौर पर हिजाब को एक धार्मिक घूंघट माना जाता है। जब महिला किसी बाहरी पुरुष की उपस्थिति में अपना सिर ढंक लेती है। हालांकि पर्दा प्रथा भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है। वेदों, पुराणों और संहिताओं में पर्दा प्रथा का कोई विवरण नहीं मिलता, फिर भी पर्दा यहां मान्यता प्राप्त है।

हिजाब विवाद का भगवाकरण:

एक फरवरी को विश्व हिजाब दिवस मनाया जाता है। इस दिवस के प्रचलन का बहुत छोटा समयकाल है। पहली बार 2013 में मनाया गया था। कर्नाटक में हिजाब पहनने को लेकर पिछले महीने विवाद हो गया। जब उडुपी जनपद के एक कॉलेज में कुछ लड़कियों को हिजाब पहनने की वजह से कालेज के अंदर जाने से रोक दिया गया। इस्लामी शास्त्र कुरान मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं को शालीन तरीके से कपड़े पहनने का निर्देश देता है। दासियों और वेश्याओं को घूंघट करने की सख्त मनाही थी, ऐसा करने पर उन्हें कठोर दंड दिया जाता था। कर्नाटक में हिजाब मामले पर राजनीति तो तब शुरू हुई जब कुछ लड़के उसी कालेज में कंधे पर भगवा गमछा डालकर कालेज पहुंच गए, और कहा कि यदि लड़कियों को हिजाब पहनने दिया गया तो हम भी भगवा गमछा डालेंगे और देश भर में हिजाब के औचित्य बहस शुरू हो गई।

परंपरा प्राचीन इस्लाम संस्कृति का हिस्सा:

महिलाओं को पर्दे में रखने की परंपरा इस्लाम संस्कृति में ही है, जो प्राचीन मेसोपोटामिया सभ्यता से जुड़ी है। ग्रीक और फारसी साम्राज्यों में कुलीन परिवारों में सम्मान के रूप में घूंघट पहना जाता था। भारत में घूंघट (पर्दा) की शुरुआत 12वीं सदी में इस्लामी आक्रमण के समय बचाव के लिए हिंदू महिलाएं पर्दा करने लगीं। मुगल काल में इस प्रथा को और बढ़ावा मिला। कुछ मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि इस्लामी कानून में हिजाब अनिवार्य है। अफगानिस्तान में पर्दा प्रथा का पालन बहुत ही सख्ती से किया जाता है, जहां महिलाओं को हर समय पूर्ण पर्दा करना पड़ता था। तालिबान की हुकूमत में इस पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

स्त्रियों में पर्दा को शराफत मानते थे गांधी जी:

किसी समय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी महिलाओं के पहनावे पर सलवार के पक्ष में 'फतवा' दिया था।1949 में  में 'सर्वोदय' में उनकी एक 'बातचीत' प्रकाशित हुई थी। उसमें उनका कहना है कि 'स्त्रियों के लिए पंजाब की पोशाक सबसे अच्छी है। कुर्त्ता, दुपट्टा तथा सलवार में कला है और उसमें स्त्री का अंग-अंग शराफत से ढंका रह सकता। दुपट्टे में जहां कला है, वहां जाड़े के दिनमें वह बड़ी कामकी चीज भी है। उससे बड़ा आराम रहता है। कुर्त्ता सारे शरीर को ढंक लेता है और बड़ी शोभा देता है।'

यूरोपीय देशों में हिजाब पर प्रतिबंध:

दुनिया में कुछ सरकारें हिजाब पहनने के लिए बाध्य करती हैं तो कुछ प्रतिबंध लगाए हैं। फ्रांस ने 2004 से स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध लगया था।  2011 में सार्वजनिक स्थानों पर भी चेहरा ढंकने पर प्रतिबंध लगा दिया। बुल्गारिया में चेहरा ढंकना गैरकानूनी है। जर्मनी में सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब पहनने की अनुमति नहीं है। चीन ने भी हिजाब पर प्रतिबंध लगाया है। ब्रिटेन में भेदभाव को बढ़ाव देने वाले ड्रेस कोड पर प्रतिबंध है। डेनमार्क सरकार ने हिजाब पर कड़ा कानून बनाया है। 12 हजार का जुर्माना भी तय किया है। नीदरलैंड में चेहरा ढकने पर रोक लगी है, यहा चेहरा ढंकने पर जुर्माना देना पकेगा। रूस ने भी हिजाब पर प्रतिबंध लगाया है। बेल्जिम में चेहरा ढकने पर कानूनी कार्रवाई का प्राविधान है।

Friday, 4 February 2022

धर्मयुद्ध का आह्वान

 उदय सिंह

संतों ने धर्म युद्ध का एलान किया है, लेकिन धर्म क्या है, इस सवाल का सटीक जवाब देना शायद मुश्किल है। कोई सत्य को ही धर्म कहता है, तो किसी ने इसे अफीम बताया है। कुछ लोगों का मानना है धर्म धारण करने की चीज है। बौद्धों के अनुसार संपूर्ण जगत क्षणिक पदार्थों का संघात है। जिसे दूसरे शास्त्रकार पदार्थ या भाव शब्द से व्यवहृत करते हैं, बौद्ध लोग उसे ही धर्म कहते हैं। जितने विद्वान उतनी परिभाषाएं हैं। सब अपने तर्क और विश्लेषण पर अडिग। रोम के सम्राट नीरो के पूछने पर उनके शिक्षक लुई एनियस ने बताया कि सामान्य जन धर्म को सत्य के रूप में देखते हैं। बुद्धिमानों के लिए यह मिथ्या है, और शासक इसे उपयोगी मानते हैं। 

 प्रयागराज में विश्व हिन्दू परिषद की ओर से संतों का सम्मेलन आयोजित किया है। जिसमें संतों ने हिन्दू समाज का आह्वान किया है कि पांच राज्यों में हो रहा विधान सभा चुनाव धर्मयुद्ध है। धर्म और अधर्म के बीच लड़ाई छिड़ गई है। इसलिए हिन्दुओं को धर्म की रक्षा करने वाले और संस्कृति का समर्थन करने वाली सरकार चुनना होगा। हालांकि सभी राजनीतिक दलों में हिन्दू ही हैं। संत समाज किसका प्रतिनिधत्व कर रहा है यह तो स्पष्ट है, लेकिन धर्मनिर्पेक्ष देश में किस दल को अधर्मी घोषित कर रहे हैं इसका निर्णय शायद नहीं हुआ है। भारतीय संस्कृति में धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह भारतीय संस्कृति का प्राण है। धर्म-दर्शन में धर्म से संबंधित बुनियादी सवालों पर चर्चा की जाती है और सामान्य तौर पर धर्म के स्वरूप की चर्चा की जाती है। 

ईसाइयों ने 1095 और 1291 के बीच पवित्र जेरूसलम स्थित ईसा की समाधि का गिरजाघर मुसलमानों से छीनने के लिए सात बार युद्ध किया था, इसे ही पहला धर्म युद्ध या क्रूसेड युद्ध कहा जाता है। जेरूसलम पर ईसाई, यहूदी और मुसलमान तीनों ही धर्म के लोग आज भी युद्ध जारी रखे हुए हैं। हालांकि दुनिया अधिकतर लोगों का मानना है कि पहला धर्मयुद्ध महाभारत का युद्ध था। 11वीं और 12वीं शताब्दी में भी ईसाई एवं मुसलमानों के बीच धर्म युद्ध हुए। सुलतान सलाद्दीन (1137-1193) के नेतृत्व में उनका बड़ा साम्राज्य अफ्रीका, मिस्र, पश्चिमी एशिया में फिलिस्तीन, सीरिया, अरब, ईरान और इराक तक फेल गया था, जिसका ईसाइयों को हजम नहीं हो रहा था। 

पूरी दुनिया में सैकड़ों धर्म हैं, लेकिन सात धर्मों के लोग ही अधिक हैं। हिन्दू, जैन, बौद्ध, इस्लाम, ईसाई, सिख, यहूदी और पारसी प्रमुख हैं। वुडू और पेगन को धर्म की श्रेणी में रखा जाता है। भारत भूमि अनेक धर्मों तथा सम्प्रदायों की क्रीड़ास्थली है। धार्मिक भाषा का स्वरूप क्या है, धार्मिक विश्वास का आधार क्या है, धर्मों की बुनियादी मान्यताएं क्या हैं और वे कहां तक सत्य या सही हैं इस प्रश्न उत्तर आज भी लोग ढंूढ रहे हैं। सामान्तया बताया यही जाता है कि धर्म शब्द का अर्थ उन सभी सूक्ष्म पृथग्भूत तत्त्वों से है, जो भूत और चित्त में निहित होते हैं और जगत की उत्पत्ति का हेतु है। धर्म, विश्वासों, मूल्यों, आचरण के नियमों और कर्मकांडों की एक व्यवस्था है, जो आस्था पर आधारित है, और जिसका रुझान परलोक या मृत्यु के बाद जीवन की ओर रहता है। 

प्रयागराज में आयोजित सम्मेलन में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के सदस्य जगद्गुरु ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती भी शामिल थे। जहां संतों ने धर्म युद्ध का आह्वान किया। और उत्तर प्रदेश में महंत योगी आदित्यनाथ को पुन: मुख्यमंत्री बनाने की हुंकार भरी। अति प्राचीन काल से धर्म को एक पवित्र प्रेरक तत्व के रूप में स्वीकार किया गया। धार्मिक सहिष्णुता का जो आदर्श भारत में  देखने को मिलता है वह विश्व की किसी अन्य संस्कृतियों में दुर्लभ है। प्रत्येक धर्म ने भारतीय संस्कृति के निर्माण में अपना योगदान दिया है। धार्मिक सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता और मानवतावाद जैसी आधुनिक अवधारणाओं को दरकिनार कर संत सरकार बनाने लिए समाज का जागरण करेंगे।