Friday, 27 May 2022

दुनिया में बढ़ता धार्मिक उन्माद




 उदय सिंह

एक अंतरिक्ष यान है वोयेजर वन, यह इंसानों द्वारा निर्मित ऐसी वस्तु है जो हम से इतनी दूर जा चुका है कि जहां से पृथ्वी को देख पाना भी संभव नहीं है। कुछ वर्ष पहले इसकी तस्वीर प्रकाशित हुई थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि वोयेजर वन हमारे सौर मंडल से दूर लगभग 21 अरब किलोमीटर दूर जा चुका है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि दूसरी दुनिया और आकाशगंगाओं का छोर नापने को आतुर इंसान आज भी धार्मिक विवादों से मुक्त नहीं हो सका है। धर्म शांति का संदेश देते हैं, लेकिन पाकिस्तान, कंबोडिया, भारत, थाईलैंड, ईरान और तिब्बत समेत दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां आज भी धार्मिक स्थल विवादित हैं। यरूशलम सदियों से आकर्षण और चर्चा का मुख्य केंद्र रहा है। यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों की यह पवित्र नगरी है। ईसा मसीह की कर्मभूमि रही है तो हजरत मुहम्मद यहीं से जन्नत गए थे। अल-अक्सा मस्जिद यहीं है। इसी मस्जिद से इस्लाम धर्म की उत्पत्ति मानी जाती है। इसके लिए सात बार युद्ध हो चुका है जिसे धर्मयुद्ध (क्रूसेड) कहा जाता है। 

धार्मिक युद्ध का खतरा :

यरूशलम के अल-अक्सा मस्जिद परिसर में प्रार्थना की कोशिश करने वाले तीन यहूदियों के पक्ष में कोर्ट द्वारा फैसला सुनाने के बाद यहां फिर धार्मिक युद्ध का खतरा मंडरा रहा है। यहूदी इस स्थल को दो प्राचीन मंदिरों के अवशेष के रूप में पूजते हैं, लेकिन मुस्लिमों के साथ एक समझौते के तहत उन्हें वहां पूजा करने से रोक दिया गया था। इजराइल का दावा है कि पूरा यरुशलम उसकी राजधानी है, जबकि फिलस्तीन का कहना है कि यरुशलम उसका है। फिलस्तीनी इसे राष्ट्र की राजधानी मानते हैं। अतीत में जाएं तो मालूम होगा कि ईसाइयों ने 1095 और 1291 के दौरान अपने धर्म की पवित्र भूमि यरुशलम में स्थित ईसा की समाधि का गिरजाघर मुसलमानों से छीनने के प्रयास में जो युद्ध किए थे, इसी को सलीबी युद्ध, ईसाई धर्मयुद्ध या क्रूसेड युद्ध कहा जाता है। 1948 में भी अरब-इजरायल युद्ध हुआ। यहूदी धर्म का इतिहास लगभग 4000 साल पुराना है। यहूदियों का मानना है कि यहीं इब्राहिम ने अपने बेटे इसाक की कुर्बानी दी थी। यहीं से विश्व की उत्पत्ति हुई। पूरी दुनिया में केवल इजराइल ही यहूदी बाहुल्य देश है। 

प्रह्लादपुरी मंदिर का विवाद : 

भारत में भी कई धार्मिक स्थलों पर विवाद है। हिंदू धर्म से अलग हुए बौद्ध और जैन से तो कोई खास अनबन नहीं है लेकिन बाहरी मुल्क से तुर्कों और मुगलों के आगमन के बाद मंदिर-मस्जिद विवाद अधिक बढ़ गया। मंदिर के निर्माण की शुरुआत कब से इसे ठीक जानकारी के लिए कोई अधिकृत स्रोत नहीं मिलते लेकिन मोटे मौत पर गुप्तकाल में चौथी से छठी शताब्दी के दौरान मंदिरों के निर्माण का उल्लेख मिलता है। पहले लकड़ी से मंदिर का स्वरूप बनते थे बाद में पत्थर और ईंट से मंदिर बनाए जाने लगे। भारत में तुर्कों के आगमन के बाद ही मंदिरों को ध्वस्त किये जाने की शुरुआत हुई। इससे पूर्व मंदिरों तो तोड़े जाने का प्रमाण शायद नहीं हैं। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुल्तान शहर में भी प्रह्लादपुरी मंदिर विवादों में है। कहा जाता है कि इसे असुरों के राजा हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने बनवाया था, जो हिंदू देवता नरसिंह को समर्पित है। 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद पाकिस्तान में मुस्लिमों ने प्रह्लादपुरी मंदिर को भी ढहा दिया। 

आगरा, दिल्ली और बनारस :

विश्व प्रसिद्ध आगरा का ताज महल भी आपनी नायाब खूबसूरती के साथ विवादों से घिरा है। मुस्लिमों का मानना है कि 17वीं सदी में मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी के लिए प्यार की निशानी के रूप में यह मकबरा बनवाया था। हिंदुओं का कहना है कि ताजमहल शिव मंदिर था, जिसे शाहजहां ने तोड़कर बनवाया था। इसको लेकर 2015 में आगरा कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की गई थी। वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद फिलहाल गर्म है। हिंदुओं का कहना है कि मस्जिद के बीच शिवलिंग मिला है, इसे औरंगजेब ने तोड़वाकर मस्जिद बनवाया था। राजधानी नई दिल्ली स्थित कुतुबमीनार भी इन दिनों विवादों में घिर गया है। इतिहास में लिखा है इसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था, जबकि हिंदुओं का कहना है कि यह विष्णु स्तंभ है।

ईरान का पारसी सूर्य मंदिर:

 ईरान के तारिखानेह मंदिर-मस्जिद के विवाद से कौन परिचित नहीं होगा। इसे ईरान का सबसे प्राचीन मस्जिद कहा जाता है। यह पारसी सूर्य मंदिर अल्पसंख्यकों का धार्मिक स्थल था लेकिन 8वीं सदी में इसे तोड़कर मस्जिद बना दिया गया। कंबोडिया-थाईलैंड में प्राचीन प्रीह विहार मंदिर भी विवादों में है यह दोनों देशों की सरहद पर स्थित है। इस पर दोनों अपना अधिकार जताते हैं। कई बार लड़ाई हो चुकी है। तिब्बत के ल्हासा में स्थित पोटाला पैलेस चीन के कब्जे है। चीन ने इस स्थल पर पैसा लगाकर संग्रहालय में तब्दील कर दिया। अब यहां दर्शन के लिए तीर्थयात्रियों को अनेक परेशानियों से जूझना पड़ता है।

अमेरिका में बढ़ती कट्टरता:

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका में भी इन दिनों छद्म राष्ट्रवाद को लेकर समाज में कट्टरता का समावेश होता जा रहा है। ईसाई धर्म की श्रेष्ठता साबित करने के लिए पिछले कुछ सालों में अंध-कट्टरवाद और धार्मिक हिंसा की कई घटनाएं घटित हुई हैं। सबसे उपेक्षित अफ्रीका महाद्वीप में ऐसी घटनाएं अपेक्षाकृत कम हैं लेकिन सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक देश में मुस्लिम आबादी को पिछले कई सालों से खदेड़ा जा रहा है। उनके घर, खिड़की दरवाजे के साथ हर चीज को नष्ट किया जा रहा है। हिंसा की वजह से विवश होकर हजारों मुस्लिम परिवार देश छोड़कर कैमरून और चाड में शरण लिये हैं।

Saturday, 14 May 2022

अयोध्या की राह चला ज्ञानवापी मस्जिद विवाद


उदय सिंह

बनारस एक बार फिर सुर्खियोंं में है। इस बार मामला लगभग 350 साल पुराना ज्ञानवापी मस्जिद विवाद का है। इसका निर्माण बनारस के मशहूर ब्राह्मण परिवार ने कराया था। मूलत: यह एक


विश्वेश्वर मंदिर था। 16वीं सदी में बादशाह जहांगीर के सहयोगी वीर सिंह देव बुंदेला इसके संरक्षक थे। सत्रहवीं सदी में मंदिर के कुछ हिस्से का नवीनीकरण किया गया। ऐसा भी कहा जाता है कि 1669 में मुगल शासक औरंगजेब के आदेश पर मंदिर का विध्वंस कर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया, जो भी हो मामला 31 साल से कोर्ट में है। गौर से देखें तो काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का मामला कमोवेश अयोध्या विवाद जैसा ही रुख अख्तियार कर रहा है। हालांकि अयोध्या मामले में मस्जिद थी और इसमें मंदिर-मस्जिद दोनों हैं।

विवाद की शुरुआत कुछ इस तरह से हुई। पिछले साल बनारस की पांच महिलाओं ने लोकल कोर्ट में एक वाद दायर कर ज्ञानवापी मस्जिद परिसर स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा करने की इजाजत और सर्वे कराने की मांग की। कोर्ट ने सर्वे की इजाजत भी दे दी। कोर्ट के आदेश पर सर्वे हो चुका है। हिंदुओं का कहना है ज्ञानवापी में 1991 से पूर्व की स्थिति कायम हो और परिसर को नियमित दर्शन-पूजन के लिए सौंपा जाए। हिंदू पक्ष के मुताबिक 1669 में औरंगजेब ने यहां काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई थी। मुस्लिम पक्ष अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी इस बात से इनकार करता है। उनका कहना है कि यहां मंदिर नहीं था। मामले में हिंदू पक्ष की तीन प्रमुख मांगे हैं। पहली मांग है कि कोर्ट ज्ञानवापी परिसर को काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर का हिस्सा घोषित करे। दूसरी मांग मस्जिद ढहाने और मुस्लिमों के यहां आने पर प्रतिबंध लगे। और तीसरी मांग यहां पर मंदिर के पुरर्निर्माण की अनुमति है।  

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 21 अप्रैल को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने के सिविल जज वाराणसी के आदेश को चुनौती देने वाली अंजुमन इंतजामिया मस्जिद की याचिका खारिज कर दी थी। मस्जिद में सर्वे का मामला अब सर्वोच्च न्यायालय पहुंच चुका है। मस्जिद कमेटी ने शीर्ष कोर्ट में याचिका दाखिल कर उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी है। मस्जिद कमेटी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मामले पर जल्दी सुनवाई मांगी गई थी। कोर्ट से यथास्थिति कायम रखने का आदेश देने का आग्रह किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आदेश देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह पहले केस की फाइल देखेगा।  

आठ अप्रैल 2022 को मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता अजय कुमार मिश्र को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया। जिसे विपक्षी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कमीशन कार्यवाही रोकने की गुहार लगाई। हाईकोर्ट ने 12 मई 2022 को याचिका खारिज कर एडवोकेट कमिश्नर बदलने की मांग को ठुकरा दिया और पांच दिनों में रिपोर्ट सौंपने को कहा है। 1991 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने एक कानून पारित किया था सेस ऑफ वरशिप एक्ट। इसके मुताबिक 15 अगस्त 1947 में जो धार्मिक स्थल जिस रूप में थे, वह उसी रूप में रहेंगे। उसके साथ छेड़छाड़ या बदलाव नहीं किया जा सकता।