उदय सिंह
कच्छप!! यानी कछुआ, इसे कूर्म भी कहते हैं। शुभ और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक रूप से महत्पवूर्ण जीव है। अठारह मुख्य पुराणों मेें कूर्मपुराण एक है। भगवान विष्णु के दसावतारों में द्वितीय कूर्मावतार है। इसमें कूर्मरूपधारी विष्णु ने महर्षियों को पुरुषार्थचतुष्टय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का महात्म्य सुनाया था। लेकिन मैं यहां ऐसा कुछ नहीं सुना रहा हूं, मेरी काबिलियत का स्तर बहुत ही सामान्य है। मेरी चिंता सिर्फ कछुओं की विलुप्त होती प्रजातियों की है। जिस देश में कछुओं का इतना महत्व हो, वहां उनकी ऐसी दुर्दशा सोचनीय है। दुनिया में कछुओं की लगभग 260 प्रजातियां हैं। जानकारों का मानना है कि प्राकृतिक रूप से सम्पन्न भारत में भी कछुओं की करीब 28 प्रजातियां पाई जाती हैं। उत्तर प्रदेश में भी 14 प्रजातियां अपनी दयनीय हालत में मिल जाती हैं। कहते हैं कछुए 300 वर्षों तक जीवित रह सकते हैं, और 500 किलो तक इनका वजन हो सकता है, लेकिन तस्करों की वजह से ऐसा शायद ही संभव होता हो।
हमारे गांव में एक सागर (चारों ओर पहाड़ी नुमा भीटे से घिरा बड़ा तालाब) है। सुलतानपुर की दियरा रियासत के राजा साहब ने सैकड़ों साल पहले इसे खुदवाया था। यह जड़ी-बूटी के साथ साही और अजगर जैसे वन्य जीवों से भरपूर है। सागर की अथाह गहराई की तरह किंवदंतियां भी अनेक हैं। बचपन में हमें बताया जाए कि यह भूत पिशाच और आसुरी शक्तियों का ठिकाना है, बावजूद इसके हम पूरा दिन उसी सागर के इर्द गिर्द मंडराते फिरते। हालांकि बड़े होने पर भूतों की भ्रांतियां समाप्त हो गईं। आसपास के दर्जनों गांवों के मवेशियों की प्यास इसी सागर में बुझती थी। उसका निर्मल पानी आकाश जैसा नीला था। गर्मियों में हम बच्चे इसमें तब तक नहाते जब तक थक न जाएं। इसके अंदर बड़े-बड़े कछुए और आदम कद मछलियां कौतूहल का विषय थीं। फिर एक दिन राजा साहब की बहू रानी शिकार पर निकलीं। सागर में जहर डलवा दिया। व्याकुल होकर मछलियां ऊपर आने लगीं और पूरे सागर में पट गया। लेकिन जहर का असर कछुओं पर नहीं पड़ा, इस लिए इसमें एक बड़ा जाल फेंकवाया गया। मछलियों के साथ दो से तीन क्विंटल वजन के सैकड़ों कछुओं को भी पकड़ा गया। ट्रक में भरकर कहीं भेज दिये गए। यह सिलसिला जारी रहा, लेकिन कछुओं को बचाने कोई नहीं आया।वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 तहत कछुओं को कब्जे रखना या मारना आपराधिक दायरे में आता है, फिर भी 18 नाखून, 20 और 21 नाखून वाले कछुओं की खूब तस्करी होती है। कहते हैं 16 नाखून वाला कछुआ काफी महंगा होता है। दुनिया में भारतीय कछुओं को सबसे खूबसूरत माना जाता है। इनकी नरम और कड़ी परत के आधार पर कीमतें तय की जाती है। तंत्र विद्या से जुड़े लोगों का मानना है कि नरम परत वाले कछुओं को रखने से धन वर्षा होती है। यह गोरखधंधा न जाने कब से जारी है, लेकिन इनकी रोकथाम के लिए कोई पर्याप्त प्रबंध नहीं किया। इस जीव के संरक्षण के लिए 23 मई को विश्व कूर्म (कछुआ) दिवस भी मनाया जाता है। भारत में सिर्फ ओडिशा में एकमात्र कछुआ संरक्षण परियोजना है, जो भीतरकनिका नाम से मशहूर है। जिसकी शुरुआत 1989 में हुई थी। वाराणसी में गंगा एक्शन प्लान के तहत कछुआ सेंचुरी स्थापित की गई, लेकिन एक दशक में हजारों कछुए यहां से गायब हो चुके हैं। पूरे देश में धड़ल्ले से कछुए की तस्करी होती है। अफसोस है कि कछुओं की 28 प्रजातियों में हम 17 प्रजातियां खत्म कर चुके हैं।

