Wednesday, 24 November 2021

वस्तु में अनावश्यक का निष्कासन ही कला है


 उदय सिंह

मैं कला मर्मज्ञ नहीं हूं। न ही कलाकृतियों का समीक्षक या विश्लेषक, जो पेंटिंग के रंग, रेखाओं, रहस्यमयी दृश्य और उसके बिंब प्रतिबिंब जैसे तत्वों को प्रतिध्वनित करने वाले गूढ़त्व को आसानी से समझ सकूं, लेकिन उसे जानने और आत्मसात करने की जिज्ञासा जरूर है। कला, अपने समय की सौंदर्यशास्त्र, विचारधाराओं, नैतिकता, दर्शन, राजनीति और सामाजिक रीति-रिवाजों को जानने का उपयोगी माध्यम है। 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली कलाकारों में एक पाब्लो पिकासो आज ही के दिन यानि 25 अक्टूबर 1881 को दक्षिणी स्पेन के मैलागा, अंडालूसिया शहर में पैदा हुए थे, लेकिन अधिकांश जीवन फ्रांस और इटली में बिताया। वह असाधारण कलात्मक प्रतिभा के धनी थे, जिन्हें उपलब्धियों के लिए सार्वभौमिक प्रसिद्धि मिली। 

प्रतीकवाद से प्रेरित पाब्लो पिकासो का कहना था कि "मैं वस्तुओं के चित्र वैसे बनाता हूं जैसा उनकी कल्पना करता हूं, न कि वैसा जैसा मैं उन्हें देखता हूं। हर वह चीज वास्तविक है जिसकी तुम कल्पना कर सकते हो। दरअसल वस्तु में अनावश्यक का निष्कासन ही कला है"। उनकी पेंटिंग में अतियथार्थवाद की विशेषताएं होती हैं। संदर्भ और शैली अनूठे रूप में है। जिसमें ज्यादातर चित्रों में गरीबों की पीड़ा और थकान का चित्रण है। कुछ ऐसी भी हैं जो सबसे महंगी पेंटिंग में शुमार हैं। "फेम्स डी अल्जीर" 179.4 मिलियन डॉलर और "गारकोन ए ला पाइप" 104 मिलियन डॉलर में बिकने का रिकार्ड है। "द ओल्ड गिटारिस्ट" पाब्लो पिकासो की महान चित्रकला नमूना है।

पिकासो की सैकड़ों पेंटिंग में न जाने क्यों "द ओल्ड गिटारिस्ट" ही मुझे सर्वाधिक आकर्षक लगती है। इसमें एक बुजुर्ग संगीतकार को दिखाया गया है, जो बार्सिलोना, स्पेन की गलियों में अपने गिटार पर टिका हुआ है। एक भिखारी है। कुछ और चित्रकार हैं जो मुझे बेहद पसंद हैं, इसमें शीर्ष पर विन्सेंट वॉन गॉग नाम है। वह विलक्षण कलाकार थे। उनकी चित्रकला
जिजीविषा और वेदना का प्रतिनिधित्व करती है। ज़िंदगी की जद्दोजहद बताने में वॉन गॉग सबसे निराले थे।  लियोनार्डो दा विंसी, क्लॉड मोनेट, माइकल एंजेलो, जोहान्स वर्मीर, मोनेट और फ्रीडा कैहलो के चित्र में भी मानसोत्पन्न वस्तुस्थिति व सम्पूर्णता झलकती हैं। कला का सबसे मौलिक महत्व सजावट के रूप में नहीं बल्कि बौद्धिक संचार के एक मार्ग के रूप में है। दृश्य द्वारा प्रदान किया गया आनंद संततवाही होता है। अपने आप में अद्भुत और स्वीकार्य प्रेरणा है।

पिकासो की द ओल्ड गिटारिस्ट पेंटिंग को आज भी शिकागो के आर्ट इंस्टीट्यूट में प्रतिदिन हजारों लोग देखते हैं। इसकी कीमत करोड़ों डॉलर है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पेंटिंग कभी नहीं बिकेगा, क्योंकि यह अनमोल है। कहा जाता है कि पिकासो ने करीब 12,000 चित्र बनाये थे। उन्होंने विश्व युद्ध की उथल-पुथल, क्लेशातुर चीखती चिल्लाती महिलाएं और भयावह मंज़र को अपनी कलाकृतियों के जरिये उन्मदिष्णु नाजीवाद-फासिज़्म को दिखाया है। इसके लिए कई बार उन्हें अराजकतावादियों के विरोध का भी सामना भी करना पड़ा। कला जो कभी रूढ़िवादी समय में बौद्धिक रूप से चुनौतीपूर्ण हुआ थी, अब मुख्यधारा की संस्कृति का हिस्सा है। 8 अप्रैल 1973 को यह महान चित्रकार दुनिया से विदा हो गया।

Source:- 

World art(the essential illustrated history)

Magazine:- the great artists

http://www.atelier-rc.com

Saturday, 20 November 2021

अन्नदाता ही मतदाता हैं

 उदय सिंह

प्रकाश पर्व इस बार सचमुच देश के किसानों के लिए "प्रकाश" लेकर आया है। अब तीनों कृषि कानून वापस होंगे। जीवटता,जुझारूपन और जुनून की यह मिसाल है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के किसान लगभग एक साल से तीनों कानूनों को वापस लेने के लिए सड़कों पर डेरा जमाए बैठे थे। उनकी बातों को नजरअंदाज किया गया। उन्हें खालिस्तानी, पाकिस्तानी और आतंकवादी तक कहा गया। आखिरकार सरकार को किसानों की सत्याग्रह के सामने झुकना पड़ा। सत्याग्रह, मतलब सत्य के लिए आग्रह। इस नि:शस्त्र का इस्तेमाल 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय जनसमुदाय के खिलाफ पारित ट्रांसवाल एशियाटिक अध्यादेश के विरोध में किया था। तब अंग्रेजी हुकूमत को यह कानून भंग करना पड़ा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संदेश में कहा कि "मैं देशवासियों से क्षमा मांगते हुए सच्चे मन से और पवित्र हृदय से कहना चाहता हूं कि शायद हमारी तपस्या में कोई कमी रही होगी जिसके कारण किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाए। मैं पूरे देश को, ये बताना चाहता हूं कि हमने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है। इस महीने के अंत में शुरू होने वाले संसद सत्र में तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे"। यह फैसला अगर पहले लिया गया होता तो करीब 500 से अधिक किसानों की मौत होने से बच जाती।

अब अचानक ऐसा क्या हुआ जो कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया गया? कहीं भाजपा को हाल ही में 13 राज्यों में हुए उपचुनावों में मिली हार के बाद अगले साल पांच राज्यों में होने वाला विधानसभा चुनाव खोने का डर तो नहीं है। जहां करीब 17.84 करोड़ मतदाता हैं। बौखलाहट का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पार्टी की सदस्यता लिये एक-एक व्यक्ति के मोबाइल पर भाजपा संपर्क साध रही है। उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर, पंजाब और उत्तराखंड विधानसभाओं का कार्यकाल अगले साल समाप्त हो जाएगा। इसमें पंजाब को छोड़कर बाकी राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। पंजाब में कांग्रेस की सरकार है।

 पिछले एक साल से तीनों कानूनों के कसीदे गढ़ने में मसरूफ थे, कहा जा रहा था कि यह आजादी के बाद सबसे बड़ा कृषि सुधार वाला कदम है। पारंपरिक खेली में आमूलचूल परिवर्तन होगा, किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। 25 सितंबर 2020 को कृषि कानूनों के विरोध में राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान भी किया गया था। इसका असर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा, केरल और अन्य राज्यों के हिस्सों में भी दिखा। पंजाब में दो तक रेलवे सेवाएं निलंबित रहीं। अब विधानसभा चुनाव नजदीक आ गए हैं तो जनाधार बटोरने के लिए राजनीतिक दल सक्रिय को गए हैं।

पंजाब की राजनीति में दिलचस्पी लेने वाले कुछ जानकारों का कहना है कि इस बार आम आदमी पार्टी का जनाधार सबसे मजबूत है। पंजाब के गांवों में भी आप की ठीकठाक पकड़ है। अकाली दल, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस बेचैन का यही सबब है। 40 सीटों वाले गोवा सदन में 2017 में कांग्रेस को 17 सीटें मिली थी। भाजपा को सिर्फ 13 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। इस बार तृणमूल कांग्रेस भी टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस के दम पर गोवा में ताल ठोक रही हैं। 70 सीटों वाले उत्तराखंड में कांग्रेस की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है। मणिपुर में 60 सीटें हैं, यहां अधिकतर सीटें कांगे्रस के खाते में जाती हुई दिख रही हैं। लखीमपुर खीरी में कृषि कानून का विरोध कर रहे किसानों को गाड़ी कुचलने और कुछ अन्य ज्वलंत मुद्दों को लेकर उत्तर प्रदेश में इस बार भाजपा की सीटें काफी कम हो सकती है।

यह तीनों कानून कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण-संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020 थे। जिस पर देश भर अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों और कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों ने अपने-अपने स्तर पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। इसमें एक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग भी लागू है। सरकार का मानना था कि नए कृषि कानूनों के तहत कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग लागू होने से किसानों की आय बढ़ेगी। आजादी से पहले अंग्रेजों की नीतियां अधिकतर जमींदारों और साहूकारों को लाभ पहुंचने के लिए बनायी जाती थी। जिनसे देश के किसान दरिद्र हो जाते और उनका शोषण किया जाता।

17 सितंबर, 2020 को लोकसभा ने तीनों कृषि कानूनों को मंजूर किया था, राष्ट्रपति  इस पर 27 सिंतबर को दस्तखत किए थे। कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले पर लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं प्रतिक्रिया दी है। हालांकि किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है कि हम अब भी उस दिन का इंतजार करेंगे जब कृषि कानूनों को संसद में रद्द किया जाएगा।

नवाज़ देवबंदी का एक शेर है।

ख़ुश्बू ख़ुश्बू लिपटे रहना सांपों की मजबूरी है,

वर्ना अपनी बे-क़दरी पर संदल रोने लगता है।

Wednesday, 17 November 2021

नई अन्नपूर्णा और पुरानी अन्नपूर्णा

उदय सिंह

अन्नपूर्णा, अन्न की अधिष्ठात्री देवी (दुर्गा का एक रूप) काशी में इनका बड़ा माहात्म्य है। इन दिनों कनाडा से लाई गईं "नई अन्नपूर्णा" की खंडित मूर्ति को नवनिर्मित काशी विश्वनाथ कारीडोर में रानी भवानी स्थित उत्तरी गेट के बगल में 15 नवंबर को प्रतिष्ठापित किया गया है। हिंदू धर्म शास्त्रों में खंडित प्रतिमा को मंदिर में प्रतिष्ठापित करना वर्जित है। प्रख्यात ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर वास्तु विद्या के भी महान आचार्य थे। उनकी रचना बृहत्संहिता  वास्तुशास्त्र और प्रतिमाशास्त्र पर ही आधारित है। उन्होंने खंडित प्रतिमा का निषेध किया है।

पुराण ग्रन्थ भी वास्तुशास्त्र का विवरण प्रस्तुत करते हैं। इसमें मत्स्य पुराण सर्वाधिक उल्लेखनीय है जिसमें मूर्तिकला से सम्बन्धित विवरण विस्तार से दिये गये हैं। वास्तु शास्त्र के कुछ प्राचीन आचार्यों के नाम भी हैं। भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित, विशालाक्ष, पुरन्दर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र और बृहस्पति स्थापत्यकला और मूर्ति के बारे में विवरण प्रस्तुत करते हैं। खंडित प्रतिमा पर लगभग सभी एकमत रहे हैं कि इसको मंदिर में रखने से नकारात्मक ऊर्जा फैलती है। इस लिए उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। गंगा और देश अन्य पवित्र नदियों की तलहटी में खोजें तो सैकड़ों टूटी हुई मूर्तियां मिल जाएंगी। 

काशी की प्राचीनता वैदिक युग तक जानी जाती है। रामायण महाभारत में भी इसकी महत्ता का गुणगान है। संस्कृत शिक्षा का केंद्र रही काशी में सदियों से धर्म-कर्म और अध्यात्म की सीख देने के लिए विद्वानों जमघट लगा रहता है, लेकिन कनाडा से लाकर स्थापित की गई इस खंडित मूर्ति पर कोई कुछ नहीं बोल रहे हैं। बल्कि अवाक और नि:शब्द हैं। अन्नपूर्णा की मूर्ति के बारे में बताया जा रहा है कि इसको काशी के किसी स्थान से "मैकेंजी" नामक यात्री कनाडा लेकर चला गया था, लेकिन कब और कहां से चुराया था यह किसी को नहीं मालूम।  मूर्ति कितनी पुरानी है इसका न तो कोई रिकार्ड है और न ही कोई बताने को तैयार है। जबकि आधुनिक युग में रेडियोकार्बन डेटिंग (आयु निर्धारण) की विधि से लाखों वर्ष पहले निर्मित वस्तुओं की तिथि आसानी से पता लगाया जा सकता है। रेडियोकार्बन किसी भी वस्तु के नाइट्रोजन के क्षय पर निर्भर करती है।

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर से थोड़ा हटकर एक और  अन्नपूर्णा देवी हैं,(असली अन्नपूर्णा) जिसका विशाल मंदिर है। इसका निर्माण पेशवा बाजी राव (1720-1740) ने करवाया था। जहां आज अच्छी खासी कमाई होती है। विशेषतौर पर धनतेरस के दिन यहां दर्शन और पूजन के लिए काफी लंबी लाइन लगती है, कहा जाता है कि इनकी महिमा से यहां कोई भी भूखा नहीं रहता। इस मंदिर का काशी अन्नपूर्णा अन्नक्षेत्र ट्रस्ट और कई शिक्षण संस्थाएं संचालन करती हैं। ट्रस्ट को हर साल करोड़ों की आमदनी होती है। नई प्रतिमा पर काशी दो गुटों बंटी हुई दिख रही है। कह सकते हैं कि कहीं खुशी कहीं गम है।

अभी सिर्फ तीन वर्ष पहले की बात है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा वाराणसी आईं थी। काशीविश्वनाथ का दर्शन करने। इसका काशी में काफी विरोध किया गया था, क्योंकि वह ईसाई धर्मावलंबी परिवार से ताल्लुक रखती हैं। हालांकि कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने मंदिर के गर्भगृह में जाकर दर्शन पूजन किया गया। आक्षेप लगाया गया कि प्रियंका के दर्शन करने से हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। आज 100 वर्षों तक कनाडा में रही खंडित मूर्ति को कितना वाजिब माना जाए। 

देवी-देताओं, धर्म-कर्म, मठ-मंदिर और जाति-पात के नाम पर काशी में ठगी नई बात नहीं है। यह सब यहां सदियों से होता आ रहा है। अन्नपूर्णा की नई प्रतिमा की स्थापना भी इससे कुछ खास अलग नहीं है। यहां होने वाली धनवर्षा आकर्षण केंद्रबिंदु है। काशी विश्वनाथ कारीडोर धार्मिक कम पर्यटन की नई ठौर ज़्यादा बन रहा है। किसी जमाने में होमगार्ड की नौकरी करने वाले को नई अन्नपूर्णा की प्रतिमा का पुजारी बनाया गया है, जो पिछले चार पांच वर्षों में करोड़ों की संपत्ति बना चुके हैं।

Tuesday, 16 November 2021

भीख वाली आज़ादी में दबी कंगना की राजनीतिक महत्वाकांक्षा


 पद्मश्री से सम्मानित अभिनेत्री कंगना रनौत ने 1947 में मिली भारत की आजदी को "भीख" बताया है, असली आजादी 2014 में मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनीं। यह देश की एकता और अखंडता को कलुषित करने वाला अविचारपूर्ण निरर्थक बयान है। आलोचना के बाद अभिनेत्री ने सवाल भी खड़ा किया है कि 1947 में कौन सी लड़ाई हुई थी जिसे आजादी कहेंगे। वह ऐसा क्यों कह रही हैं, इस समय क्यों कह रही हैं यह सब समझने की बात है। क्या वह "भीख" वाली आजादी के बहाने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाहिर कर रही हैं या फिर चुनावी बहार में नया "मुद्दा" बना रही हैं। ताकि देश के अन्य मुद्दों पर धूल चढ़ जाए। बेहतर होता कि अभिनेत्री यह सवाल पद्मश्री सम्मान प्राप्त करते समय स्वयं पूछ लेंती, या फिर प्रतिवर्ष 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का जब सम्बोधन होता है, तब पूछ लेतीं।

 15 अगस्त 1947 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले पर भाषण दिया था तब से आज तक इसी स्थान पर देश का प्रधानमंत्री आजादी के उपलक्ष्य में देश की जनता को सम्बोधित करते हैं। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर इन दिनों देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। 12 मार्च 1930 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह की शुरुआत की थी। पिछले साल 2020 में नमक सत्याग्रह के 91 वर्ष पूरे हुए हैं। इसी लिए प्रधानमंत्री मोदी ने साबरमती आश्रम से अमृत महोत्सव की शुरुआत की, जो 15 अगस्त 2023 तक मनाया जाएगा।

कांग्रेसी नेताओं अलावा भारतीय जनता पार्टी से ही अटल बिहारी वाजपेयी भी इस देश में तीन बार प्रधानमंत्री बने, पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए। दूसरी बार 1998 से 1999 तक 13 महीने लिए और उसके बाद 1999 से 2004 तक प्रधानमंत्री रहे। क्या तब अभिनेत्री को यह देश आजाद नहीं लग रहा था या वह आजादी महसूस नहीं कर रही थीं। " तथाकथित राष्ट्रवाद" का ढोल पीटने वाले भी इस बयान पर कुछ भी कहने से कतरा रहे हैं। यह सोचने वाली बात है। हालांकि महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने ज़रूर अभिनेत्री की टिप्पणी को पूरी तरह से गलत है। भाजपा सांसद वरुण गांधी ने भी ट्वीटर पर नाराजगी जाते हुए लिखा कि इस सोच को पागलपन कहूं या देशद्रोह।

दिल्ली महिला आयोग की प्रमुख स्वाति मालीवाल ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखकर कंगना रनौत की पद्मश्री को वापस लेने का आग्रह किया। साथ ही कंगना रनौत के खिलाफ देशद्रोह के आरोप में केस दर्ज करने की मांग की है। इस पर अभी तक कोई सरकारी प्रतिक्रिया भी देखने को नहीं मिली है। कंगना को समझना चाहिए कि देश की आज़ादी के लिए केंद्रीय संस्कृति राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने आजादी का अमृत महोत्सव मोबाइल ऐप भी लांच किया है। जहां भारत की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाने से जुड़ी जानकारी उपलब्ध होगी।

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के भम्ब्ला गांव में पैदा हुई कंगना सचमुच इतिहास को जानने के लिए बौद्धिक कसरत दिखाएं तो उन्हें सहज ही मालूम हो जाएगा कि उनके सूबे में ही अनंत राम, जगदीश सिंह, ठाकुर दास, धनि राम, लक्ष्मण दास, ठाकुर वरयाम सिंह, वतन सिंह, ख़ुशी राम, गोपी राम, जमना देवी, लक्ष्मण दास ने आजदी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

1857 के विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बताने वाली अभिनेत्री यदि इतिहासकारों को पढ़ें तो अनेक जानकारी हासिल कर सकेंगी। आरसी मजुमदार, विपिन चन्द्र जैसे प्रसिद्ध इतिहासकारों ने इस पर खूब लिखा है। 1857 को लेकर मजुमदार  ने अपनी पुस्तक sepoy mutiny and the revolt में विस्तारपूर्वक स्पष्ट किया है। उसका अनुरोध है यह महासंग्राम नहीं बल्कि अलग अलग स्थानों पर यह भिन्न-भिन्न रूप में था। लार्ड डलहौजी की राज्यों को हड़पने की नीति डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स के तहत अवध, झांसी, नागपुर, सतारा और संबलपुर को ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी में मिला लिया। ऐसे में यह सभी अंग्रेजों के हाथों शर्मिंदगी और हार का बदला लेने के लिए यह 1857 से समर में कूदने को तैयार हुए।

अभिनेत्री ने देश के विभाजन के साथ ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी लपेटे में ले लिया है। महात्मा गांधी ने भगत सिंह को मरने क्यों दिया। नेताजी बोस की हत्या क्यों की गई। इन सभी विषयों पर ऐसे अविवेकपूर्ण बयान से देश के प्रतिभाशाली युवाओं में बुद्धिभेद और आज़ादी को लेकर स्थापित विचार में विरोधाभास की समस्या खड़ी हो सकती है। देश के हजारों विश्वविद्यालयों में भारतीय इतिहास बढ़ा रहे प्रोफेसर और शिक्षकों को अभिनेत्री कंगना की चुनौती स्वीकार कर अपने विशालहृदयता और उदारता का परिचय देना चाहिए।

Wednesday, 10 November 2021

ऊंघते हुए जलवायु परिवर्तन पर मंथन


 उदय सिंह

स्कॉटलैंड (ब्रिटेन) के सबसे अधिक आबादी वाले शहर ग्लासगो में ऊंघते हुए Conference of the Parties (COP26) जलवायु शिखर सम्मेलन चल रहा है। 31 अक्टूबर से 12 नवंबर यानि कल तक चलेगा। संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाले दुनिया के लगभग 200 देश इसमें शामिल हुए हैं। जहां इन देशों के राष्ट्राध्यक्ष, जलवायु विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों समेत 30,000 से अधिक लोग जलवायु परिवर्तन से होने वाले खतरों पर मंथन कर रहे हैं। चौगिर्द कार्बन उत्सर्जन को कम करने, प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र मज़बूत करने के साथ जंगलों को अनिवार्य रूप से बचाने के लिए अमेरिका, रूस, चीन, भारत, ऑस्ट्रेलिया समेत करीब-करीब सभी देेेशों ने आंखें चुराते हुए डिप्लोमैटिक तरीके से अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। 

कुछ अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट और विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन की वजह से पिछले कुछ दशकों से प्राकृतिक घटनाओं में अचानक बदलाव होने लगे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। दुनियाभर में तूफ़ानों की संख्या और भूकंपों की आवृत्ति बढ़ गई है। जंगल बियाबान हो रहे हैं, दावानल जैसे साधारण बात हो गई है। अमेजन के जंगलों में 2019 में 5,318 आग की घटनाएं हुई हैं। पिछले साल 6,803 आग की घटना हुई थी। अमेरिका के जंगलों में भी सैकड़ों आग की घटनाएं हुईं। इसके बाद ब्राज़ील और पराग्वे के जंगलों में भीषण आग लगी है। रूस के सबसे ठंडे इलाके साइबेरिया के जंगल में भी इस साल आग लगने की घटनाएं देखने को मिली है। यूरोप में भारी बारिश के कारण नदियों में बाढ़ का विकराल स्वरूप का असर इंसानों और जीव जन्तुओं पर पड़ा है। यह जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है। भारत में प्रतिवर्ष 16 लाख से अधिक लोग वायु प्रदूषण (अन्य प्रदूषण भी) के कारण मौत के शिकार होते हैं। मौसम विज्ञान संगठन ने चेताया था कि अभूतपूर्व सूखा, कहीं भारी बारिश तो कहीं बारिश की भारी कमी रहने वाली है।

ग्लासगो  (COP26) जलवायु शिखर सम्मेलन 12 नवंबर को समाप्त हो जाएगा। इसके बाद शुरू होगा "गरीब देशों" को आंखें दिखाने, दुनिया की आंखों में धूल झोंकने और आरोप प्रत्यारोप का दौर। क्योंकि सबसे अधिक कार्बन डाईऑक्साइड गैस का उत्सर्जन करने वाला देश चीन है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद भारत का ही नंबर है। लेकिन भारत में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन इन देशों की अपेक्षा बहुत कम है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने 2019 में प्रति व्यक्ति जनसंख्या के लिए 1.9 टन कार्बनडाई ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन किया, जबकि उसी वर्ष अमेरिका में 15.5 टन और रूस में प्रतिव्यक्ति 12.5 टन था। 18 वर्षीय स्वीडिश पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थुनबर्ग ने  कहा है कि COP26 जलवायु शिखर सम्मेलन विफल साबित हुआ है।

गौर करें तो पता चलेगा कि विकसित देशों ने पिछले 200 वर्षों में औद्योगीकरण के दौरान बेलगाम उत्सर्जन किया। आरामतलबी और विचारों में खुर्दरापन की वजह से आज पूरी दुनिया में पर्यावरण की स्थिति भयावह होने के कगार पर है। 1970 के दशक में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघ (ईयू) कार्बन उत्सर्जन में शिखर पर पहुंच गए। जबकि अमेरिका और जापान ने 2007 और 2013 में सर्वाधिक उत्सर्जन किया। दुनिया में एकमात्र कार्बन नकारात्मक देश भूटान है। वह जितना उत्पादन करता है, उससे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विश्व नेताओं के समक्ष जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में जीवनशैली में बदलाव की ज़रूरत को रेखांकित किया है। 

कार्बनडाईआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, सल्फरडाईऑक्साइड आदि के उत्सर्जन में अत्याधिक वृद्धि पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ाने का प्रमुख कारण है। ग्लासगो सम्मेलन में घोषित दो प्रमुख समझौतों पर विश्व के कई नेताओं ने सहमति व्यक्त की है। पहला, वनों की कटाई को रोकने और दूसरा, 2030 तक मीथेन उत्सर्जन को कम करना। यह बैठक विशेष रूप से जैव विविधता के संकट पर केंद्रित है। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री तक रखना है। 

पेड़ पौधे ही सबसे ज़्यादा कार्बनडाइऑक्साइड सोखते हैं। हमारे देश में पौधरोपण के लिए भी अभियान, महाभियान चलाया जाता है , बाद में उसे देखने कोई नहीं जाता कि रोपित पौधे सुरक्षित हैं या मुरझा गए। वंगारी मुता मथाई एक केन्या सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद थीं।(अब नहीं हैं) उन्होंने लगभग तीन करोड़ से अधिक पेड़ लगाए हैं। इसके लिये उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

Monday, 1 November 2021

बारूद के गुबार में दीपोत्सव


 उदय सिंह

आमतौर पर लोग आतिशबाजी अपने अन्तरात्मा के सुखद एहसास (खुशी) को अभिव्यक्त करने के लिए करते हैं। चाहे कोई जश्न हो या फिर बड़ी जीत हासिल हुई हो। इसका चलन सामानरूप से दुनिया भर में देखने को मिलता है। रंग-बिरंगी आतिशबाजी के जरिये यह प्रमाणित करते हैं कि वह खुश हैं। ऐसे ही दीपावली पर भी पटाखा फोडऩे की परम्परा सदियों से है। इसके सौन्दर्यबोध और दार्शनिक पहलू को छोड़ दें तो आमजन के लिए यह हानिकारक ही साबित होता है। शायद इसी लिए प्रतिवर्ष सुप्रीम कोर्ट को पटाखों के निर्माण में प्रतिबंधित रसायन प्रयोग और उससे होने वाले नुकसान पर नाराजगी और चिंता व्यक्त करनी पड़ती है। इस साल भी सतर्क और सचेत किया है। 

ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि भारत में आतिशबाजी का प्रचार कब से हुआ। इसकी शुरुआत कैसे और कहां हुई इस पर अलग-अलग मत हैं। हालांकि आतिशबाजी के अविष्कार का कोई लिखित और स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। कई जानकारों और इतिहासकारों का मानना है कि यह 15वीं शताब्दी में भारत पहुंचे मुगलों की देन है। (बाबर ने ही सबसे पहले तोप में बारूद का इस्तेमाल किया) इसी के बाद पटाखों का चलन शुरू हुआ। कुछ अन्य इतिहासकारों का अनुमान है कि आठवीं-नौवीं शताब्दी में बारूद का आविष्कार चीन में किया गया। यह एक आकस्मिक घटना थी। चीन में मांस पकाते समय किसी के हाथ से पिसा हुआ नमक अंगारों पर गिर गया, जिसमें चिंगारी जैसे नीले रंग का प्रकाश निकलने लगा। कौतूहलवश ऐसे ही फिर किया गया है। किसी ने उसमें शोरा का चूर्ण मिला दिया। कुछ हद तक इसे ही बारूद बनाने का प्रथम प्रयास माना जाना चाहिए।

वाराणसी से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र आज में 1936-1946 के बीच "एक किताबी कीड़ा" लेख प्रकाशित होता था, जिसे गंगा शंकर मिश्र (बीएचयू पुस्तकालय अध्यक्ष) लिखते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वह बीएचयू लाइब्रेरी की लगभग सभी किताबों को पढ़ लिये थे। उन्होंने बारूद और आतिशबाजी के इतिहास पर एक शोधपरक लेख लिखा था। जिसमें दुनिया भर की किताबों और पत्र पत्रिकाओं का जि़क्र किया है। विजय नगर दरबार में "अब्दुर्रजाक" 1443 में सुल्तान शाहरुख का राजदूत था। उसने दीपावली का कोई खास विवरण तो नहीं किया लेकिन इतना जरूर लिखा है कि भारत में महानवमी के उत्सव पर आतिशबाजी का प्रदर्शन होता था। एक इतालवी यात्री था, लुडोविको डि वर्थेमा (1470-1517) वह एक तीर्थयात्री के रूप में मक्का में प्रवेश करने वाले पहले गैर-मुस्लिम यूरोपीय लोगों में से एक के लिए जाने जाते थे। 1502 में वर्थेमा भारत आया था, उसने भी विजय नगर में आतिशबाजी का प्रदर्शन देखा था। 

ऐसे ही पेशवा बखर से मालूम होता है कि महाद जी सिंधिया ने (1727- 1794) कोटा राज्य में दीपावली पर आतिशबाजी का प्रदर्शन देखा था। यहां राक्षसों और वानरों के पुतले भी बारूद से बनाये जाते थे। सिन्धिया ने इसका पूरा विवरण पेशवा सवाई माधवराव को लिखा। पेशवा की आज्ञा से पूना में भी वैसे ही प्रदर्शन की व्यवस्था की गयी। "वारीसा" नामक एक यात्री, जो 1518 में भारत आया था, लिखा है कि गुजरात में मांगलिक कार्यक्रम के अवसर पर बाण खूब छोड़े जाते हैं। 

हेनरी यूल (1820-1889) एक स्कॉटिश ओरिएंटलिस्ट और भूगोलवेत्ता थे। यात्रा पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं। कोक बर्नेल (1840-1882 ) एक अंग्रेजी सिविल सेवक थे, जिन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी में सेवाएं दी। संस्कृत और द्रविड़ भाषाओं के विद्वान माने जाते थे। यूल और बर्नेल ने अपने "हाव्सन जाव्सन" नामक कोश में 1613 से 1883 तक के कुछ दीपावली  उत्सवों का वर्णन किया है। उसमें उन्होंने राजस्थान के कोटा यात्रा विवरण का एक उदाहरण दिया है, जिसमें बताया है कि दशहरा के बीसवें दिन दीपावली पड़ती है, इसमें रोशनी व आतिशबाजी का प्रदर्शन होता है।

 लक्ष्मण भाम जी खोपकर की मराठी में दीपावली बहार नाम से एक पुस्तक है। यह किताब 1886 में प्रकाशित हुई थी। इसमें आतिशबाजियों के नाम और उनके बनाने की विधि बतायी गयी है। दीपावली पर आतिशबाजी के प्रदर्शन के ऐसे कुछ उल्लेख मिलते हैं, लेकिन इतना तो स्पष्ट ही है कि 15वीं सदी से पहले ही यह परम्परा चली आ रही है। संत एकनाथ ने भी अपने मराठी काव्य रुक्मणी स्वयंबर में आतिशबाजी का जिक्र किया है।

 भांडारकर प्राच्य शोध संस्थान महाराष्ट्र के पुणे में स्थित एक संस्थान है। इसकी स्थापना 6 जुलाई 1917 को रामकृष्ण गोपाल भांडारकर की स्मृति में की गई थी। यहां प्रो. पीके गोडे का आतिशबाजी पर एक खोजपूर्ण निबंध है। उनका कहना है कि जहां तक मुझे ज्ञात हो सका है, आतिशबाजी का उल्लेख 15वीं सदी और उसके बाद के ग्रन्थों में ही मिलता है। अवध के नवाब आसफुद्दौला (1775-1797 ) के समय में अंग्रेज "विलायती आतिशबाजी" से नवावों का मनोरंजन करते थे। 1790 में इसका एक विशाल प्रदर्शन हुआ। आज भारत मे सबसे अधिक पटाखों का उत्पादन तमिलनाडु के शिवकाशी में किया जाता है। भारत का 55 प्रतिशत पटाखा उत्पादन यहीं होता है। देश भर में पटाखा फोडऩे की वजह से  दीपावली बीत जाने के बाद भी वातावरण प्रदूषित रहता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना उचित ही है कि, उत्सव मनाना ठीक है लेकिन इसे मौज-मस्ती (एंज्वायमेंट) नहीं बनाना चाहिए है।