Thursday, 14 October 2021

त्यौहारों की जुगाली करते फेस्टिवल ऑफर

उदय सिंह

लगभग पूरी दुनिया को गिरफ्त में लेने के बाद कोरोना महामारी का अस्तित्व अब लगभग क्षीर्ण हो रहा है। ऐसे में इस साल त्यौहारों में थोड़ी चहल-पहल और रौनक बढऩे की उम्मीद है। त्यौहार पर्यावरण और मौसम के अनुकूल होते हैं, जिसका वैविध्य सुखद और स्फूर्तिदायक वातावरण का सृजन करता है। हमें इसके सभी आयामों और विचारतत्व को समझे का प्रयास करना चाहिए। हालांकि पर्व और त्यौहारों के गूढ़ अर्थ से अनभिज्ञ तकनीक में दक्ष होते कई अत्याधुनिक लोग इसके महत्व, मर्म, मूल्यों और विशेषताओं को भूलते जा रहे हैं। 

इस बार बाजार में त्यौहार का कोई खास उल्लास नहीं दिख रहा है। लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वर्चुअल दुनिया में धूम मची है। यहां तरह तरह के ऑफर और प्रलोभनों के जरिये ग्राहकों को आकर्षित करने की होड़ मची है। ऐसे मालूम होता है कि जैसे त्यौहारों का सबसे अधिक इंतजार इन कंपनियों को ही है, ताकि कोरोना के छोड़े गए दुर्दिन से निजात पा सकें। यह कंपनियों के लिए त्यौहार से बढ़कर धनवर्षा का इवेंट है। विजयादशमी, दशहरा और दीपावली जैसे तीनों शब्द अलग हैं वैसे ही उनकी मान्यताएं और संदेश भी अलग हैं। 

इन त्यौहारों को सदियों से मनाया जा रहा है। सब अपनी रीति, नीति, परम्परा और नवाचार के अनुसार मनाते हैं। लेकिन कुछ प्रदेशों में इसे काफी प्रसिद्धि मिली है। जैसे छत्तीसगढ़ का बस्तर, कर्नाटक का मैसूर, हिमाचल प्रदेश का कुल्लू और राजस्थान के कोटा में मनाए जाना वाला दशहरा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी मशहूर है। भारत के अलावा कुछ अन्य देशों में भी अपनी परंपरा और मान्यता के अनुसार मनाए जाते हैं। चीन, श्रीलंका, इडोनेशिया, थाइलैंड और मलेशिया और नेपाल में भी विजयादशमी को मनाया जाता है। 

विजयादशमी की मान्यता है कि राजा रघु के कुल में इन्दुमती के गर्भ से उत्पन्न महाराजा अज के बेटे अयोध्या के राजा दशरथ के जेष्ठ पुत्र भगवान श्रीरामचंद्र ने इसी दिन पुलस्त्य मुनि के पुत्र विश्रवा के महाप्रतापी पुत्र राक्षसों का सम्राट दशग्रीव रावण पर विजय प्राप्त की थी, क्योंकि लंकापति दशानन ने श्रीरामचंद्र की अर्धांगिनी व मिथिला नरेश सीरध्वज जनक की बेटी भूमिकी (सीता) का छल से हरण कर लिया था। इसी प्रतिशोध में हर साल देश भर दशकंधर का पुतला फूंका जाता है, लेकिन मध्यप्रदेश का एक जनपद मंदसौर है, जहां लंकेश को मारा नहीं जाता क्योंकि वहां उसकी ससुराल थी। मय दानव की पुत्री मंदोदरी का यहीं मायका था। इस लिए वह यहां का दामाद हुआ। कुछ लोगों का मानना है कि मंदोदरी का संबंध मेरठ से था और जोधपुर के पास एक स्थान है मंदोर से भी। हकीकत, युगद्रष्टा ही जानें।

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी पुण्यतिथि को दशहरा कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन राजा सगर के प्रपौत्र दिलीप पुत्र भगीरथ की कठोर तपस्या के बाद गिरिमण्डलगामिनी स्वर्ग से भूलोक आइ थीं। गंगावतरण के उपलक्ष्य में इस दिन हजारों श्रद्धालु काशी के दशाश्वमेध घाट पर सदानीरा में स्नान करते हैं, जिसका अलग महात्म है। ऐसा भी माना जाता है कि जब सभी देवतागण महिषासुर से परास्त हो गए तब त्रिदेव की शक्ति से उत्पन्न आदिशक्ति देवी दुर्गा ने महिषासुर से नौ दिन घनघोर संग्राम किया और दसवें दिन काशी के अस्सी घाट पर उसका वध किया था। दीपावली दीपों का उत्सव है। लेकिन अब दीपदान और तर्पण तो शायद ही कोई करता हो, रात दिन जुआ जरूर खेलते हैं। दीपावली वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद आती है। बरसात में कई तरह के जीव-जन्तु, सड़े गले पदार्थ की वजह से पर्यावरण दूषित हो चुका होता है, ऐसे में घरों की साफ-सफाई करना जरूरी हो जाता है। दीपावली पर सब अपने घरों की रंगाई पोताई कर सुंदर बनाते हैं। त्योहारों की पृष्ठभूमि को लेकर हम सभी को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।