Wednesday, 10 November 2021

ऊंघते हुए जलवायु परिवर्तन पर मंथन


 उदय सिंह

स्कॉटलैंड (ब्रिटेन) के सबसे अधिक आबादी वाले शहर ग्लासगो में ऊंघते हुए Conference of the Parties (COP26) जलवायु शिखर सम्मेलन चल रहा है। 31 अक्टूबर से 12 नवंबर यानि कल तक चलेगा। संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाले दुनिया के लगभग 200 देश इसमें शामिल हुए हैं। जहां इन देशों के राष्ट्राध्यक्ष, जलवायु विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों समेत 30,000 से अधिक लोग जलवायु परिवर्तन से होने वाले खतरों पर मंथन कर रहे हैं। चौगिर्द कार्बन उत्सर्जन को कम करने, प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र मज़बूत करने के साथ जंगलों को अनिवार्य रूप से बचाने के लिए अमेरिका, रूस, चीन, भारत, ऑस्ट्रेलिया समेत करीब-करीब सभी देेेशों ने आंखें चुराते हुए डिप्लोमैटिक तरीके से अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। 

कुछ अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट और विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन की वजह से पिछले कुछ दशकों से प्राकृतिक घटनाओं में अचानक बदलाव होने लगे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। दुनियाभर में तूफ़ानों की संख्या और भूकंपों की आवृत्ति बढ़ गई है। जंगल बियाबान हो रहे हैं, दावानल जैसे साधारण बात हो गई है। अमेजन के जंगलों में 2019 में 5,318 आग की घटनाएं हुई हैं। पिछले साल 6,803 आग की घटना हुई थी। अमेरिका के जंगलों में भी सैकड़ों आग की घटनाएं हुईं। इसके बाद ब्राज़ील और पराग्वे के जंगलों में भीषण आग लगी है। रूस के सबसे ठंडे इलाके साइबेरिया के जंगल में भी इस साल आग लगने की घटनाएं देखने को मिली है। यूरोप में भारी बारिश के कारण नदियों में बाढ़ का विकराल स्वरूप का असर इंसानों और जीव जन्तुओं पर पड़ा है। यह जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है। भारत में प्रतिवर्ष 16 लाख से अधिक लोग वायु प्रदूषण (अन्य प्रदूषण भी) के कारण मौत के शिकार होते हैं। मौसम विज्ञान संगठन ने चेताया था कि अभूतपूर्व सूखा, कहीं भारी बारिश तो कहीं बारिश की भारी कमी रहने वाली है।

ग्लासगो  (COP26) जलवायु शिखर सम्मेलन 12 नवंबर को समाप्त हो जाएगा। इसके बाद शुरू होगा "गरीब देशों" को आंखें दिखाने, दुनिया की आंखों में धूल झोंकने और आरोप प्रत्यारोप का दौर। क्योंकि सबसे अधिक कार्बन डाईऑक्साइड गैस का उत्सर्जन करने वाला देश चीन है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद भारत का ही नंबर है। लेकिन भारत में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन इन देशों की अपेक्षा बहुत कम है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने 2019 में प्रति व्यक्ति जनसंख्या के लिए 1.9 टन कार्बनडाई ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन किया, जबकि उसी वर्ष अमेरिका में 15.5 टन और रूस में प्रतिव्यक्ति 12.5 टन था। 18 वर्षीय स्वीडिश पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थुनबर्ग ने  कहा है कि COP26 जलवायु शिखर सम्मेलन विफल साबित हुआ है।

गौर करें तो पता चलेगा कि विकसित देशों ने पिछले 200 वर्षों में औद्योगीकरण के दौरान बेलगाम उत्सर्जन किया। आरामतलबी और विचारों में खुर्दरापन की वजह से आज पूरी दुनिया में पर्यावरण की स्थिति भयावह होने के कगार पर है। 1970 के दशक में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघ (ईयू) कार्बन उत्सर्जन में शिखर पर पहुंच गए। जबकि अमेरिका और जापान ने 2007 और 2013 में सर्वाधिक उत्सर्जन किया। दुनिया में एकमात्र कार्बन नकारात्मक देश भूटान है। वह जितना उत्पादन करता है, उससे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विश्व नेताओं के समक्ष जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में जीवनशैली में बदलाव की ज़रूरत को रेखांकित किया है। 

कार्बनडाईआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, सल्फरडाईऑक्साइड आदि के उत्सर्जन में अत्याधिक वृद्धि पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ाने का प्रमुख कारण है। ग्लासगो सम्मेलन में घोषित दो प्रमुख समझौतों पर विश्व के कई नेताओं ने सहमति व्यक्त की है। पहला, वनों की कटाई को रोकने और दूसरा, 2030 तक मीथेन उत्सर्जन को कम करना। यह बैठक विशेष रूप से जैव विविधता के संकट पर केंद्रित है। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री तक रखना है। 

पेड़ पौधे ही सबसे ज़्यादा कार्बनडाइऑक्साइड सोखते हैं। हमारे देश में पौधरोपण के लिए भी अभियान, महाभियान चलाया जाता है , बाद में उसे देखने कोई नहीं जाता कि रोपित पौधे सुरक्षित हैं या मुरझा गए। वंगारी मुता मथाई एक केन्या सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद थीं।(अब नहीं हैं) उन्होंने लगभग तीन करोड़ से अधिक पेड़ लगाए हैं। इसके लिये उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

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