उदय सिंह
प्रकाश पर्व इस बार सचमुच देश के किसानों के लिए "प्रकाश" लेकर आया है। अब तीनों कृषि कानून वापस होंगे। जीवटता,जुझारूपन और जुनून की यह मिसाल है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के किसान लगभग एक साल से तीनों कानूनों को वापस लेने के लिए सड़कों पर डेरा जमाए बैठे थे। उनकी बातों को नजरअंदाज किया गया। उन्हें खालिस्तानी, पाकिस्तानी और आतंकवादी तक कहा गया। आखिरकार सरकार को किसानों की सत्याग्रह के सामने झुकना पड़ा। सत्याग्रह, मतलब सत्य के लिए आग्रह। इस नि:शस्त्र का इस्तेमाल 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय जनसमुदाय के खिलाफ पारित ट्रांसवाल एशियाटिक अध्यादेश के विरोध में किया था। तब अंग्रेजी हुकूमत को यह कानून भंग करना पड़ा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संदेश में कहा कि "मैं देशवासियों से क्षमा मांगते हुए सच्चे मन से और पवित्र हृदय से कहना चाहता हूं कि शायद हमारी तपस्या में कोई कमी रही होगी जिसके कारण किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाए। मैं पूरे देश को, ये बताना चाहता हूं कि हमने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है। इस महीने के अंत में शुरू होने वाले संसद सत्र में तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे"। यह फैसला अगर पहले लिया गया होता तो करीब 500 से अधिक किसानों की मौत होने से बच जाती।
अब अचानक ऐसा क्या हुआ जो कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया गया? कहीं भाजपा को हाल ही में 13 राज्यों में हुए उपचुनावों में मिली हार के बाद अगले साल पांच राज्यों में होने वाला विधानसभा चुनाव खोने का डर तो नहीं है। जहां करीब 17.84 करोड़ मतदाता हैं। बौखलाहट का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पार्टी की सदस्यता लिये एक-एक व्यक्ति के मोबाइल पर भाजपा संपर्क साध रही है। उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर, पंजाब और उत्तराखंड विधानसभाओं का कार्यकाल अगले साल समाप्त हो जाएगा। इसमें पंजाब को छोड़कर बाकी राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। पंजाब में कांग्रेस की सरकार है।
पिछले एक साल से तीनों कानूनों के कसीदे गढ़ने में मसरूफ थे, कहा जा रहा था कि यह आजादी के बाद सबसे बड़ा कृषि सुधार वाला कदम है। पारंपरिक खेली में आमूलचूल परिवर्तन होगा, किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। 25 सितंबर 2020 को कृषि कानूनों के विरोध में राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान भी किया गया था। इसका असर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा, केरल और अन्य राज्यों के हिस्सों में भी दिखा। पंजाब में दो तक रेलवे सेवाएं निलंबित रहीं। अब विधानसभा चुनाव नजदीक आ गए हैं तो जनाधार बटोरने के लिए राजनीतिक दल सक्रिय को गए हैं।
पंजाब की राजनीति में दिलचस्पी लेने वाले कुछ जानकारों का कहना है कि इस बार आम आदमी पार्टी का जनाधार सबसे मजबूत है। पंजाब के गांवों में भी आप की ठीकठाक पकड़ है। अकाली दल, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस बेचैन का यही सबब है। 40 सीटों वाले गोवा सदन में 2017 में कांग्रेस को 17 सीटें मिली थी। भाजपा को सिर्फ 13 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। इस बार तृणमूल कांग्रेस भी टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस के दम पर गोवा में ताल ठोक रही हैं। 70 सीटों वाले उत्तराखंड में कांग्रेस की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है। मणिपुर में 60 सीटें हैं, यहां अधिकतर सीटें कांगे्रस के खाते में जाती हुई दिख रही हैं। लखीमपुर खीरी में कृषि कानून का विरोध कर रहे किसानों को गाड़ी कुचलने और कुछ अन्य ज्वलंत मुद्दों को लेकर उत्तर प्रदेश में इस बार भाजपा की सीटें काफी कम हो सकती है।
यह तीनों कानून कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण-संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020 थे। जिस पर देश भर अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों और कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों ने अपने-अपने स्तर पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। इसमें एक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग भी लागू है। सरकार का मानना था कि नए कृषि कानूनों के तहत कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग लागू होने से किसानों की आय बढ़ेगी। आजादी से पहले अंग्रेजों की नीतियां अधिकतर जमींदारों और साहूकारों को लाभ पहुंचने के लिए बनायी जाती थी। जिनसे देश के किसान दरिद्र हो जाते और उनका शोषण किया जाता।
17 सितंबर, 2020 को लोकसभा ने तीनों कृषि कानूनों को मंजूर किया था, राष्ट्रपति इस पर 27 सिंतबर को दस्तखत किए थे। कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले पर लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं प्रतिक्रिया दी है। हालांकि किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है कि हम अब भी उस दिन का इंतजार करेंगे जब कृषि कानूनों को संसद में रद्द किया जाएगा।
नवाज़ देवबंदी का एक शेर है।
ख़ुश्बू ख़ुश्बू लिपटे रहना सांपों की मजबूरी है,
वर्ना अपनी बे-क़दरी पर संदल रोने लगता है।
Kisan ki jai
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