उदय सिंह
यूरोपीय देशों का खोखलापन उजागर:
1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद जो स्थिति थी वैसे हालात अब रूस के नहीं हैं। वह समृद्ध और शक्तिशाली हो चुका है। गौर करें तो सारी खुराफात की जड़ अतीत में हीहै। 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद अतिमहत्वाकांक्षा कुछ देश मुंह फुलाए असंतुष्ट थे। लिहाजा यूरोप में पूर्वी और पश्चिमी दो धड़ों की लकीर खिंच गई। अमेरिका पश्चिमी यूरोप की अगुवाई कर रहा था तो सोवियत संघ पूर्वी हिस्से का। इसी दरम्यान अमेरिकी नेतृत्व में साम्यवादी सोवियत संघ के प्रसार रोकने के लिए 4 अप्रैल 1949 को 12 देशों को शामिल करते हुए उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की स्थापना हुई। इसका मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ की गतिविधियों पर नजर रखना था। जवाब में सोवियत संघ ने भी पूर्वी यूरोप को मिलाकर 1955 में वारसा संधि स्थापित कर ली, ताकि वह नाटो का मुकाबला कर सके। करीब 45 वर्षों तक दोनों गुटों में तनातनी होती रही, हालांकि लड़ाई कभी नहीं हुई। इसी दौर को हम शीतयुद्ध कहते हैं। 26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ का विघटन हो गया और राष्ट्रपति गोर्बाचेव ने वारसा संधि को खत्म कर दिया, लेकिन अमेरिकी नेतृत्व का नाटो समाप्त नहीं किया गया, बल्कि उसका विस्तार जारी रहा। आज नाटो में 30 देश शामिल हो चुक हैं। यूक्रेन भी नाटो में शामिल होना है, जिसका रूस ने विरोध किया लेकिन यूक्रेन ने उसे नजरअंदाज कर दिया। अब कोई यूरोपीय देश भी इस युद्ध में खुलेतौर पर सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहें हैं।
अमेरिका का मोहरा बना यूक्रेन:
उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) केअनवरत विस्तार पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लगातार विरोध करते रहे हैं। उनकी बातों को कभी संजीदगी से नहीं लिया गया। अब यूक्रेन के नाटो में शामिल होने की बात पर रूस ने चेतावनी दी थी कि यदि वह उसमें शामिल हुआ तो उसको खामियाजा भुगतना पड़ेगा। यूक्रेन ने जिद नहीं छोड़ी, लिहाजा रूस ने उस पर हमला कर दिया। खैर युद्ध जारी है। अमेरिका ने कहा था कि वह सीधे तौर पर युद्ध में शामिल नहीं होगा, और ना ही नाटो शामिल होगा, लेकिन अब बयान बदल गए हैं। अमेरिका और यूरोपीय देश रूस पर अनेक प्रतिबंध लगा चुके हैं। पूरी कोशिश है कि उसे दुनिया से अलग थलग कर दिया जाए। यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर बेल्जियम के सबसे बड़े शहर राजधानी ब्रसेल्स में नाटो, सात औद्योगिक देशों के समूह और 27 सदस्यीय यूरोपीय परिषद ने आपातकालीन बैठक की। जहां अमेरिका के साथ पश्चिमी देशों के नेताओं ने रूसी आक्रमण के खिलाफ एक एकजुट दिखे। इसे अभूतपूर्व बताया जा रह है।
भारत का कूटनीतिक हथियार :
यूक्रेन रूस के बीच युद्ध में सबसे अधिक दबाव भारत पर है कि वह किधर है अमेरिका की ओर या फिर रूस के साथ, लेकिन भारत कूटनीतिक रुख अख्तियार किया है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के लाख दबाव के बावजूद वह उनके झांसे में नहीं आ रही है। भारत, रूसी हथियारों का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है। रूसी निर्मित लड़ाकू जेट, पनडुब्बियां, और न जाने कितने टैंकों का संचालन करता है। लगभग 10 अरब डॉलर मूल्य के हथियार अब भी रूस से मंगा रहा है। इनमें परमाणु पनडुब्बी और एस-400 शामिल हैं। 2021-22 के लिए भारत का संपूर्ण रक्षा बजट 70 अरब डॉलर है। कुछ दिन पहले दिल्ली में पीएम मोदी से जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा की मुलाकात हुई, फुमियो किशिदा ने अमेरिका की तरफदारी करते हुए लोकतंत्रों के सहयोग का आह्वान किया। जबकि मोदी ने उनके केवल आर्थिक मुद्दों पर बात की। पीएम नरेंद्र मोदी के साथ दूसरे वर्चुअल शिखर बैठक में आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्काट मारिसन ने भी यूक्रेन पर हमले के लिए रूस को जिम्मेदार ठहराया। भारत की ओर सिर्फ आर्थिक मुद्दों पर ही चर्चा हुई।
अमेरिकी वर्चस्व और नाटो के अस्तित्व पर खतरा:
एक महीने से रूस यूक्रेन पर कहर बरपा रहा है। अमेरिका और नाटो सदस्य देश तमाशाबीन बने हैं। देखा जाए तो यह कितना हास्यास्पद है कि जिस नाटो में शामिल होने के लिए यूकेन रूस से दुश्मनी मोल लिया वह जब अब तक उसके लिए कुछ भी नहीं कर सका। अमेरिका विश्व बिरादरी से रूस को अलग करना चाहता है कि लेकिन देखा जाए तो नाटो के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा है। जब वह अपने दोस्त की मदद नहीं कर सकता तो तो उसका क्या औचित्य। अब चर्चा है कि पुतिन पर नूरमबर्ग अदालत की तरह ही मामला चलाया जाएगा। इसके लिए विश्व 140 से अधिक नेताओं और अन्य लोगों ने याचिका पर हस्ताक्षर किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नाजी युद्ध अपराधियों की जांच के लिए गठित नूरमबर्ग अदालत बनाई गई थी। शायद अमेरिका सबसे बड़ा कष्ट यह है कि दुनिया पर उसका वर्चस्व मुट्ठी में फिसलती रेत जैसा है।



