Saturday, 26 March 2022

क्षीर्ण होता अमेरिकी वर्चस्व


 उदय सिंह

यूक्रेन और रूस के बीच लगभग एक महीने से युद्ध जारी है। बमबारी में यूक्रेन के 95 फीसद शहर बर्बाद होकर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। बिजली, पानी और बुनियादी जरूरतों के लिए डवडबाई आंखों से यूक्रेन के नागरिक पड़ोसी मुल्कों को ताक रहें। हाहाकार जैसी स्थिति है। सड़कों व इमारतों की संगमरमरी चिकनाहट बीहड़ जैसी हो गई है। दिन-रात मिसाइलों की चिर्राहट से यूरोपीय के देशों की नींद काफूर  हो चुकी है। अब आहिस्ता-आहिस्ता छिपकलियों की तरह रेंगते हुए रूसी सैनिक राजधानी कीव पर कब्जा करने को आतुर हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की गीली आंखों से अमेरिका और नाटो सदस्यों देशों से मदद की याचना करने लगे हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने वैश्विक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। उनके के हौंसले बुलंद हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने कहा है कि यदि रूस यूक्रेन में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करता है तो नाटो जवाब देगा। लेकिन यह जवाब कैसा होगा यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है, कम से कम सैन्य मदद तो नहीं है। 

यूरोपीय देशों का खोखलापन उजागर:

1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद जो स्थिति थी वैसे हालात अब रूस के नहीं हैं। वह समृद्ध और शक्तिशाली हो चुका है। गौर करें तो सारी खुराफात की जड़ अतीत में हीहै। 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद अतिमहत्वाकांक्षा कुछ देश मुंह फुलाए असंतुष्ट थे। लिहाजा यूरोप में पूर्वी और पश्चिमी दो धड़ों की लकीर खिंच गई। अमेरिका पश्चिमी यूरोप की अगुवाई कर रहा था तो सोवियत संघ पूर्वी हिस्से का। इसी दरम्यान अमेरिकी नेतृत्व में साम्यवादी सोवियत संघ के प्रसार रोकने के लिए 4 अप्रैल 1949 को 12 देशों को शामिल करते हुए उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की स्थापना हुई। इसका मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ की गतिविधियों पर नजर रखना था। जवाब में सोवियत संघ ने भी पूर्वी यूरोप को मिलाकर 1955 में वारसा संधि स्थापित कर ली, ताकि वह नाटो का मुकाबला कर सके। करीब 45 वर्षों तक दोनों गुटों में तनातनी होती रही, हालांकि लड़ाई कभी नहीं हुई। इसी दौर को हम शीतयुद्ध कहते हैं। 26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ का विघटन हो गया और राष्ट्रपति गोर्बाचेव ने वारसा संधि को खत्म कर दिया, लेकिन अमेरिकी नेतृत्व का नाटो समाप्त नहीं किया गया, बल्कि उसका विस्तार जारी रहा। आज नाटो में 30 देश शामिल हो चुक हैं। यूक्रेन भी नाटो में शामिल होना है, जिसका रूस ने विरोध किया लेकिन यूक्रेन ने उसे नजरअंदाज कर दिया। अब कोई यूरोपीय देश भी इस युद्ध में खुलेतौर पर सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहें हैं।

अमेरिका का मोहरा बना यूक्रेन: 

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के
अनवरत विस्तार पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लगातार विरोध करते रहे हैं। उनकी बातों को कभी संजीदगी से नहीं लिया गया। अब यूक्रेन के नाटो में शामिल होने की बात पर रूस ने चेतावनी दी थी कि यदि वह उसमें शामिल हुआ तो उसको खामियाजा भुगतना पड़ेगा। यूक्रेन ने जिद नहीं छोड़ी, लिहाजा रूस ने उस पर हमला कर दिया। खैर युद्ध जारी है। अमेरिका ने कहा था कि वह सीधे तौर पर युद्ध में शामिल नहीं होगा, और ना ही नाटो शामिल होगा, लेकिन अब बयान बदल गए हैं। अमेरिका और यूरोपीय देश रूस पर अनेक प्रतिबंध लगा चुके हैं। पूरी कोशिश है कि उसे दुनिया से अलग थलग कर दिया जाए। यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर बेल्जियम के सबसे बड़े शहर राजधानी ब्रसेल्स में नाटो, सात औद्योगिक देशों के समूह और 27 सदस्यीय यूरोपीय परिषद ने आपातकालीन बैठक की। जहां अमेरिका के साथ पश्चिमी देशों के नेताओं ने रूसी आक्रमण के खिलाफ एक एकजुट दिखे। इसे अभूतपूर्व बताया जा रह है। 

भारत का कूटनीतिक हथियार :

यूक्रेन रूस के बीच युद्ध में सबसे अधिक दबाव भारत पर है कि वह किधर है अमेरिका की ओर या फिर रूस के साथ, लेकिन भारत कूटनीतिक रुख अख्तियार किया है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के लाख दबाव के बावजूद वह उनके झांसे में नहीं आ रही है। भारत, रूसी हथियारों का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है। रूसी निर्मित लड़ाकू जेट, पनडुब्बियां,  और न जाने कितने टैंकों का संचालन करता है। लगभग 10 अरब डॉलर मूल्य के हथियार अब भी रूस से मंगा रहा है। इनमें परमाणु पनडुब्बी और एस-400 शामिल हैं। 2021-22 के लिए भारत का संपूर्ण रक्षा बजट 70 अरब डॉलर है। कुछ दिन पहले दिल्ली में पीएम मोदी से जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा की मुलाकात हुई, फुमियो किशिदा ने अमेरिका की तरफदारी करते हुए लोकतंत्रों के सहयोग का आह्वान किया। जबकि मोदी ने उनके केवल आर्थिक मुद्दों पर बात की। पीएम नरेंद्र मोदी के साथ दूसरे वर्चुअल शिखर बैठक में आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्काट मारिसन ने भी यूक्रेन पर हमले के लिए रूस को जिम्मेदार ठहराया। भारत की ओर सिर्फ आर्थिक मुद्दों पर ही चर्चा हुई। 

अमेरिकी वर्चस्व और नाटो के अस्तित्व पर खतरा:

एक महीने से रूस यूक्रेन पर कहर बरपा रहा है। अमेरिका और नाटो सदस्य देश तमाशाबीन बने हैं। देखा जाए तो यह कितना हास्यास्पद है कि जिस नाटो में शामिल होने के लिए यूकेन रूस से दुश्मनी मोल लिया वह जब अब तक उसके लिए कुछ भी नहीं कर सका। अमेरिका विश्व बिरादरी से रूस को अलग करना चाहता है कि लेकिन देखा जाए तो नाटो के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा है। जब वह अपने दोस्त की मदद नहीं कर सकता तो तो उसका क्या औचित्य। अब चर्चा है कि पुतिन पर नूरमबर्ग अदालत की तरह ही मामला चलाया जाएगा। इसके लिए विश्व 140 से अधिक नेताओं और अन्य लोगों ने  याचिका पर हस्ताक्षर किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नाजी युद्ध अपराधियों की जांच के लिए गठित नूरमबर्ग अदालत बनाई गई थी। शायद अमेरिका सबसे बड़ा कष्ट यह है कि दुनिया पर उसका वर्चस्व मुट्ठी में फिसलती रेत जैसा है।

Saturday, 12 March 2022

सत्याग्रह और राजनीति का "नमक"


 उदय सिंह


मरहम के नहीं हैं ये तरफ़-दार नमक के 

निकले हैं मिरे ज़ख्म तलबगार नमक के, 

आया कोई सैलाब कहानी में अचानक 

घुल गए पानी में वो किरदार नमक के। 

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले "द पंजाबी तड़का" के मशहूर शेफ हैं, हरपाल सिंह सोखी। उनका एक तकिया कलाम है नमक शमक, नमक शमक डाल देते हैं...। व्यंजन में नमक का महत्व जिस सलीके बताते हैं वह काबिले तारीफ है। देश की आजादी से पहले से ही नमक अपनी अहमियत के लिए समय समय पर चर्चा में रहा है। भोजन के अलाव वास्तुशास्त्र में भी नमक को उपयोगी माना गया है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी नमक पड़ गया, और चुनाव का जायका दिया। आज ही दिन ठीक 92 वर्ष पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह की शुरुआत कर अंग्रेजों के बनाए नमक कानून को तोड़ा था। जिसे हम लोग दांडी मार्च कहते हैं। अभी दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव संपन्न हुआ है। इस चुनाव में भी सबसे अधिक नमक खाने की चर्चा रही। चुनाव प्रचार के वक्त यूपी के मैनपुरी में एक वृद्ध महिला का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह बुजुर्ग महिला कृतघ्नता जाहिर करते हुए बोल रही थी कि मैंने प्रधानमंत्री मोदी का नमक खाया है, धोखा नहीं देंगे। आखिर नमक ने अपना असर दिखा दिया। योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे।

मां विंध्यवासिनी जीवनभर चुकाएंगे नमक का कर्ज:

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नमक का सहारा लिया। कहा, मां विंध्यवासिनी आपने हमारा नमक नहीं खाया है। नमक तो हमने आपका खाया है। उस नमक का जीवनभर कर्ज चुकाता रहूंगा। 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से 24 दिनों में 390 किलोमीटर पैदल यात्रा कर दांडी पहुंचते हैं और मुट्ठी भर नमक उठाकर अंग्रेजों के बनाए नमक कानून को तोड़ दिया। नमक सत्याग्रह महात्मा गांधी के अहिंसक विरोध के सिद्धांतों पर आधारित था, इसे सत्याग्रह कहा जाता है। अंग्रेजी हुकूमत ने भारतीयों को नमक बनाने का अधिकार नहीं था। दरअसल, वर्ष 1882 नमक अधिनियम के तहत नमक संग्रह के साथ निर्माण पर अंग्रेजों का एकाधिकार हो गया। इसके जरिये नमक बेचने पर भी उन्हीं का अधिकार था। इंग्लैंड से आने वाले महंगे नमक का ही इस्तेमाल भारतीयों को करना पड़ता था, ताकि ब्रिटेन के व्यापारी मालामाल हो सकें। 

कोरोना काल में नमक के भाव आसमान पर,:

देश को आजादी मिले 75 साल हो गए, लेकिन आज भी नमक अपनी कीमतों को लेकर बहस-मुबाहिसा में बना रहता है। गांधी के नमक सत्याग्रह से अमेरिका के अश्वेत आंदोलनकारी मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन यहां नेता और व्यापारी नहीं। कोरोना काल में कई प्रदेशों के सुदूर इलाकों में लोगों को 130 रुपये किलो नमक खरीदना पड़ा। यह विदेशी व्यापारी नहीं भारतीय हैं जो नमक बेच कर मनमाना मुनाफा कमाते हैं। सात आठ साल पहले की बात है, बिहार में 100 से 150 रुपये किलो तक नमक बेचा गया, हालांकि सरकार की ओर से इसे अफवाह करार दिया गया। आज नमक सत्याग्रह पर जगह-जगह गोष्ठियां हो रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने आज गुजरात से ट्वीट किया कि आज के ही दिन इसी धरती से दांडी यात्रा की शुरुआत हुई थी। जब गांधीजी ने अंग्रेजी हुकूमत को भारतीयों के सामथ्र्य का एहसास कराया था। काश, इस सामथ्र्य को वह भारतीय व्यापारियों को भी समझा सकते।

Thursday, 10 March 2022

राजनीति की "माया"


उदय सिंह

चुनाव में हार जीत ही होती है। एक हारता है तो दूसरा दल जीतता है। इसमें अचरज जैसी बात नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में एक नई और "खास बात" है, बहुजन समाज पार्टी का समाप्त होना। बसपा खत्म होने की कगार है। देशभर में इसके समर्थक इन दिनों असमंजस और दुविधा में हैं, कि कहां जाएं। फिलहाल पंजाब में आम आदमी पार्टी तो उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है, जिसका परिणाम दोनों राज्यों में देखने को मिला है। लेकिन यह स्थायी है कि नहीं, यह तो समय ही बताएगा। बसपा दलित वोटों के आधार पर एक खास वर्ग की बहुत बड़ी संख्या का प्रतिनिधित्व करती है। पार्टी का अस्तित्व खत्म होने से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने वोटों को भाजपा के शिफ्ट कर दिया। उन्होंने अपने मतदाताओं से स्पष्ट कह दिया था कि वह भाजपा को वोट करें। अपने राजनीतिक जीवन में बसपा का कोई उत्तराधिकारी भी नहीं तैयार नहीं होने दिया। अंत में पूरा जनाधार उन्हीं को सौंप दिया जिसे वह धुर विरोधी और मनुवादी कहती थी। ऐसा उन्होंने क्यों किया इसमें उन्हीं का व्यक्तिगत लाभ और स्वार्थ निहित है। तो क्या अब यह मान लिया जाए कि मायावती राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठना चाहती हैं। दलितों में विश्वास पैदा करने के लिए भाजपा रामनाथ कोविन्द को राष्ट्रपति बनाया था। 

समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ भारत रत्न भीमराव रामजी अम्बेडकर के जन्मदिन पर 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना हुई। संस्थापक थे पंजाब के रोपड़ जिले में 15 मार्च 1934 पैदा हुए कांशी राम थे। कांशी राम ने देश में बिखरे दलित वोटों को संगठित करने का अथक प्रयास किया, जिसका पूरा लाभ मायावती को मिला। वह एक सशक्त राजनीतिज्ञ के तौर पर उभरीं और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं। वह सनातन हिंदू विचारधारा के खिलाफ दलितों को साधने में कामयाब रहीं। उनके भाषणों में मनुवाद और मनुवादी हमेशा निशाने पर रहते। शायद इसी लिए बुद्धिज्म में उनकी आस्था ज्यादा थी। यही कारण रहा कि पिछड़ी जातियों के लोगों में भी बुद्धिज्म का अंकुरण फूटा और बड़ी संख्या में बौद्ध हो गए। 

बाबा साहेब अम्बेडकर बंधुत्व की भावना और समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे। इसके जरिये ही आदर्श समाज बनाना चाहते थे। हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और छुआछूत से आजिज होकर 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। उनकी कल्पना आधुनिक, वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत विचारों वाले देश की थी। अछूतों से सामाजिक भेदभाव से बहुत क्षुब्ध थे, इसके खिलाफ अभियान चलाया था और दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया। देवताओं के संजाल को तोड़कर एक ऐसे मुक्त मनुष्य की कल्पना कर रहे थे जो धार्मिक होने के साथ जीवन मूल्यों के महत्व को समझे। उनका कहना था कि किसी देश का यदि राजनीतिक लोकतंत्र मजबूत करना है तो उसके लिए संसदीय लोकतंत्र की मजबूती पर ध्यान देना होगा। उनकी इसी विचारधारा को दलित नेता के मसीहा कहे जाने कांशी राम और मायावती जमीन से जोड़कर आगे ले गये। 

 भारतीय जनता पार्टी से अंदर ही अंदर समझौता होने के कारण ही इस बार मायावती विधानसभा चुनाव में बहुत ही सक्रिय नहीं दिखीं। हो सकता है सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को इसकी भनक लगी हो लेकिन वह दलित वोटरों को हथिया नहीं सके। उनके लिए आने वाला समय और चुनौतीपूर्ण होगा। 2027 के विधानसभा चुनाव में बहुत तेजी से शीर्ष की ओर बढ़ रही आम आदमी पार्टी से उन्हें जूझना पड़ेगा। जिसने पहले दिल्ली और अब पंजाब हो फतह कर लिया है। पहले उनके साथ नेताजी मुलायम सिंह का बनाया जनाधार जुड़ा था, लेकिन अगले चुनाव में नेताजी का असर काफी कम हो चुका होगा। जनता आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प के तौर पर देख रही है।