Wednesday, 8 October 2025

फिर छिड़ी बात कुत्तों की...


उदय सिंह

इन दिनों देश में सर्वाधिक चर्चा कुत्तों की है। शायद ट्रंप के टैरिफ से भी ज्यादा। जहां देखो वहीं आवारा कुत्तों का आतंक। लिहाजा उन्हें पकड़ा जा रहा है। मारा जा रहा है। "ठिकाने" भी लगाया जा रहा है। क्योंकि "सुप्रीम आदेश" मिला है। देखा जाए तो यह साल कुत्तों की धर पकड़ में ही गुजर रहा है। मतलब इसे "डॉग इयर्स" कहेंगे। लेकिन यहां नोबेल पुरस्कार से सम्मानित जर्मन उपन्यासकार, कवि और नाटककार गुंटर ग्रास का "डॉग इयर्स" नहीं है, जो 1963 में प्रकाशित हुआ था। बल्कि असली कुत्तों की बात हो रही है। गुंटर ग्रास का तो 20वीं सदी में जर्मनी की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास है, जो वाइमर गणराज्य से लेकर नाज़ी युग, द्वितीय विश्व युद्ध और युद्धोत्तर काल तक व्यंग्य करता है। फ़ासीवादी अंतर्धाराओं की निरंतरता का विश्लेषण करता है। उपन्यास तर्क देता है कि जर्मनी ने नाज़ी पापों का सामना करने के बजाय उन्हें दबा दिया, अपराधबोध को "भूमिगत" रहने दिया। लेखक नाज़ियों के उत्पाती पाखंड को उजागर करता है, कहता है कि इतिहास के कुत्ते भौंकते ही रहते हैं।

हां तो, हम कुत्तों की चर्चा की बात कर रहे थे। कुत्ते सच में वफादारी की मिसाल हैं। हम सभी इससे वाकिब हैं। रूप-रंग, भूमिकाएं अनेक हैं। कोई सौम्य तो कोई खूंखार है। आज दुनिया में 400 से अधिक नस्ल इनकी विकसित की जा चुकी है। हजारों साल से इंसानों की सोहबत में हैं बावजूद अपनी आबादी के अनियंत्रित बढ़ोत्तरी से मौजूदा वक्त में दुश्मनी बढ़ गई है। आजिज होकर सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ता है कि आवारा कुत्तों की नसबंदी की जाए। एंटी रेबीज टीका लगाकर कहीं दूर छोड़ दिया जाए। आखिर उन्हें सजा तो सुनाई नहीं जाएगी। लेकिन हां, एक बार पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक कुत्ते को एक सप्ताह जेल में रखने के बाद मौत की सज़ा सुनाई गई थी, लेकिन वह एक दुर्लभ घटना थी। अपने देश में तो कुत्तों को बांधकर बेरहमी पीटा जा रहा है। पीट-पीटकर हत्या कर हो रही है। बोरियों में भरकर "ठिकाने" लगा रहे हैं।

कुत्ते भी कुछ कम नहीं हैं। आखिर कुत्ते ही हैं। अभी हाल ही में केरल के कन्नूर में एक अजीबोगरीब घटना हुई। कुत्तों से सतर्क रहने के किए नुक्कड़ नाटक हो रहा था। कलाकार आवारा कुत्तों के काटने का अभिनय कर रहा था। लाउड स्पीकर पर भौं-भौं भौंक रहा था, तभी मंच पर एक कुत्ता आ गया और कलाकर के पैर में काट लिया। कुछ कुत्ते और भी आ गए। भगदड़ की स्थिति में कुत्तों ने बच्चों को भी काट लिया। नाटक का दिलचस्प हिस्सा यह था कि दर्शकों को लगा कि मंच पर कुत्ते का आना इत्तेफाक नहीं बल्कि नाटक का ही हिस्सा है।

 पौराणिक कथा, साहित्य, सिनेमा और खेल की दुनिया में भी कुत्तों की महिमा और वीरगाथा का वर्णन मिलता है। संस्कृत में इन्हें श्वान कहा गया तो गांवों में कुकुर की संज्ञा दी गई। वैज्ञानिकों ने इनका नाम कैनिस ल्यूपस फैमिलिएरिस रखा है। कहा जाता है कि यह ग्रे भेड़ियों (कैनिस ल्यूपस) की एक उप-प्रजाति हैं। हिंदू धर्म में भगवान भैरव को कुत्ते का स्वामी माना जाता है। तो नेपाल में तो "कुकुर तिहार" नामक एक त्योहार भी होता है। जब इनकी पूजा की जाती है, फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं। प्राचीन मिस्र की पौराणिक कथाओं में भी "अनुबिस" नामक कुत्ते के सिर वाले देवता हैं, जिन्हें अंत्येष्टि संस्कार का देवता कहा जाता था। 

सुनकर थोड़ा अजीब लगेगा लेकिन यह सच है कि दुनिया की विकास यात्रा में कुत्तों का भी योगदान इंसानों से कम नहीं है। बात 1957 की है जब सोवियत संघ "स्पुतनिक 2" अंतरिक्ष यान भेज रहा था। तब "लाइका" नामक कुतिया को भी यान के साथ अंतरिक्ष में भेजा। हालांकि वह जीवित नहीं बची, लेकिन सोवियत संघ अंतरिक्ष में किसी जीवित प्राणी को भेजने वाला पहला देश बन गया। महान विश्वविजेता "सिकंदर" की जान को भी एक कुत्ते ने ही बचाई थी। सिकंदर के पास "पेरिटास" नाम का एक कुत्ता था। माना जाता है कि इस वफ़ादार कुत्ते ने भारत में एक युद्ध के दौरान सिकंदर की जान बचाई थी। उसने घायल सिकंदर को हमलावर से बचाया था अगर सिकंदर इस युद्ध में जीवित नहीं बचता, तो जिस सभ्यता को आज हम जानते हैं, उसका अस्तित्व ही नहीं होता।

 जब हर जगह कुत्ते ही कुत्ते हैं तो भला इतिहासकार क्यों पीछे रहेंगे। इतिहासकारों ने भी इन पर खूब काम किया है। किताबों में झांको तो पता चलेगा कि सबसे पहले कुत्तों के अवशेष जर्मनी के बान-ओबरकासेल में करीब 14,000 वर्ष पहले मिले हैं, जो इंसानों के साथ दफनाए जाते थे। इनके पालतू बनाने की प्रक्रिया इससे थोड़ा पहले मानी जाती है, जो आनुवंशिक रूप से भेड़ियों के वंशज थे। माना जाता है भेड़िए इंसानों के शिविरों के आसपास बचे हुए भोजन या जूठन खाकर धीरे-धीरे  मनुष्यों के आदी हो गए। वैश्विक स्तर पर कुछ विद्वानों का मानना है कि आज पूरी दुनिया में लगभग 90 करोड़ कुत्ते हैं। करीब 47 करोड़ कुत्ते पालतू हैं। दुनिया के लगभग 75% कुत्ते या तो खुले में घूमते हैं या आवारा हैं। लेकिन इनकी उपयोगिता और योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

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