Monday, 1 November 2021

बारूद के गुबार में दीपोत्सव


 उदय सिंह

आमतौर पर लोग आतिशबाजी अपने अन्तरात्मा के सुखद एहसास (खुशी) को अभिव्यक्त करने के लिए करते हैं। चाहे कोई जश्न हो या फिर बड़ी जीत हासिल हुई हो। इसका चलन सामानरूप से दुनिया भर में देखने को मिलता है। रंग-बिरंगी आतिशबाजी के जरिये यह प्रमाणित करते हैं कि वह खुश हैं। ऐसे ही दीपावली पर भी पटाखा फोडऩे की परम्परा सदियों से है। इसके सौन्दर्यबोध और दार्शनिक पहलू को छोड़ दें तो आमजन के लिए यह हानिकारक ही साबित होता है। शायद इसी लिए प्रतिवर्ष सुप्रीम कोर्ट को पटाखों के निर्माण में प्रतिबंधित रसायन प्रयोग और उससे होने वाले नुकसान पर नाराजगी और चिंता व्यक्त करनी पड़ती है। इस साल भी सतर्क और सचेत किया है। 

ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि भारत में आतिशबाजी का प्रचार कब से हुआ। इसकी शुरुआत कैसे और कहां हुई इस पर अलग-अलग मत हैं। हालांकि आतिशबाजी के अविष्कार का कोई लिखित और स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। कई जानकारों और इतिहासकारों का मानना है कि यह 15वीं शताब्दी में भारत पहुंचे मुगलों की देन है। (बाबर ने ही सबसे पहले तोप में बारूद का इस्तेमाल किया) इसी के बाद पटाखों का चलन शुरू हुआ। कुछ अन्य इतिहासकारों का अनुमान है कि आठवीं-नौवीं शताब्दी में बारूद का आविष्कार चीन में किया गया। यह एक आकस्मिक घटना थी। चीन में मांस पकाते समय किसी के हाथ से पिसा हुआ नमक अंगारों पर गिर गया, जिसमें चिंगारी जैसे नीले रंग का प्रकाश निकलने लगा। कौतूहलवश ऐसे ही फिर किया गया है। किसी ने उसमें शोरा का चूर्ण मिला दिया। कुछ हद तक इसे ही बारूद बनाने का प्रथम प्रयास माना जाना चाहिए।

वाराणसी से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र आज में 1936-1946 के बीच "एक किताबी कीड़ा" लेख प्रकाशित होता था, जिसे गंगा शंकर मिश्र (बीएचयू पुस्तकालय अध्यक्ष) लिखते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वह बीएचयू लाइब्रेरी की लगभग सभी किताबों को पढ़ लिये थे। उन्होंने बारूद और आतिशबाजी के इतिहास पर एक शोधपरक लेख लिखा था। जिसमें दुनिया भर की किताबों और पत्र पत्रिकाओं का जि़क्र किया है। विजय नगर दरबार में "अब्दुर्रजाक" 1443 में सुल्तान शाहरुख का राजदूत था। उसने दीपावली का कोई खास विवरण तो नहीं किया लेकिन इतना जरूर लिखा है कि भारत में महानवमी के उत्सव पर आतिशबाजी का प्रदर्शन होता था। एक इतालवी यात्री था, लुडोविको डि वर्थेमा (1470-1517) वह एक तीर्थयात्री के रूप में मक्का में प्रवेश करने वाले पहले गैर-मुस्लिम यूरोपीय लोगों में से एक के लिए जाने जाते थे। 1502 में वर्थेमा भारत आया था, उसने भी विजय नगर में आतिशबाजी का प्रदर्शन देखा था। 

ऐसे ही पेशवा बखर से मालूम होता है कि महाद जी सिंधिया ने (1727- 1794) कोटा राज्य में दीपावली पर आतिशबाजी का प्रदर्शन देखा था। यहां राक्षसों और वानरों के पुतले भी बारूद से बनाये जाते थे। सिन्धिया ने इसका पूरा विवरण पेशवा सवाई माधवराव को लिखा। पेशवा की आज्ञा से पूना में भी वैसे ही प्रदर्शन की व्यवस्था की गयी। "वारीसा" नामक एक यात्री, जो 1518 में भारत आया था, लिखा है कि गुजरात में मांगलिक कार्यक्रम के अवसर पर बाण खूब छोड़े जाते हैं। 

हेनरी यूल (1820-1889) एक स्कॉटिश ओरिएंटलिस्ट और भूगोलवेत्ता थे। यात्रा पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं। कोक बर्नेल (1840-1882 ) एक अंग्रेजी सिविल सेवक थे, जिन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी में सेवाएं दी। संस्कृत और द्रविड़ भाषाओं के विद्वान माने जाते थे। यूल और बर्नेल ने अपने "हाव्सन जाव्सन" नामक कोश में 1613 से 1883 तक के कुछ दीपावली  उत्सवों का वर्णन किया है। उसमें उन्होंने राजस्थान के कोटा यात्रा विवरण का एक उदाहरण दिया है, जिसमें बताया है कि दशहरा के बीसवें दिन दीपावली पड़ती है, इसमें रोशनी व आतिशबाजी का प्रदर्शन होता है।

 लक्ष्मण भाम जी खोपकर की मराठी में दीपावली बहार नाम से एक पुस्तक है। यह किताब 1886 में प्रकाशित हुई थी। इसमें आतिशबाजियों के नाम और उनके बनाने की विधि बतायी गयी है। दीपावली पर आतिशबाजी के प्रदर्शन के ऐसे कुछ उल्लेख मिलते हैं, लेकिन इतना तो स्पष्ट ही है कि 15वीं सदी से पहले ही यह परम्परा चली आ रही है। संत एकनाथ ने भी अपने मराठी काव्य रुक्मणी स्वयंबर में आतिशबाजी का जिक्र किया है।

 भांडारकर प्राच्य शोध संस्थान महाराष्ट्र के पुणे में स्थित एक संस्थान है। इसकी स्थापना 6 जुलाई 1917 को रामकृष्ण गोपाल भांडारकर की स्मृति में की गई थी। यहां प्रो. पीके गोडे का आतिशबाजी पर एक खोजपूर्ण निबंध है। उनका कहना है कि जहां तक मुझे ज्ञात हो सका है, आतिशबाजी का उल्लेख 15वीं सदी और उसके बाद के ग्रन्थों में ही मिलता है। अवध के नवाब आसफुद्दौला (1775-1797 ) के समय में अंग्रेज "विलायती आतिशबाजी" से नवावों का मनोरंजन करते थे। 1790 में इसका एक विशाल प्रदर्शन हुआ। आज भारत मे सबसे अधिक पटाखों का उत्पादन तमिलनाडु के शिवकाशी में किया जाता है। भारत का 55 प्रतिशत पटाखा उत्पादन यहीं होता है। देश भर में पटाखा फोडऩे की वजह से  दीपावली बीत जाने के बाद भी वातावरण प्रदूषित रहता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना उचित ही है कि, उत्सव मनाना ठीक है लेकिन इसे मौज-मस्ती (एंज्वायमेंट) नहीं बनाना चाहिए है।

5 comments:

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  2. Nicely researched and we'll expressed on post festival air pollution.

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  3. बहुत ही शोधपरक और बेहतरीन अभिव्यक्ति

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