उदय सिंह
चिंतन-मनन करने वाले को मुनि कहते हैं, और ईश्वर की साधना, उपासना व भक्ति में लीन रहने वाला साधु होता है। धार्मिक व धर्मपरायण इंसान को संत कहा जाता है। भगवान के चरण-कमलों को छोड़कर उनको न अपनी देह प्रिय होती है और न घर। अभ्यास, यज्ञ, तप, श्रद्धा, व्रत, नियम, योग द्वारा परम ब्रह्म के स्वरूप को जानने का वह प्रयत्न करते हैं। कहते हैं अपने देश में त्रिकालदर्शी ऋषि और मुनि हुए हैं, लेकिन अब परिस्थिति काफी बदल चुकी है। गेरुआ रंग का चोला पहनकर साधु संत विलासितापूर्ण जीवन का आनंद ले रहे हैं। नेतागीरी करते हैं, चुनाव लड़ते हैं, मिथ्या भाषण और बढ़ चढ़कर राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं। तुलसीदास ने रामचरित्र मानस में संतों के कुछ लक्षण बताए हैं। षटविकार जित अनध अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुख धामा। अमितबोध अनीह मित भोगी। सत्यसार कवि कोबिद जोगी। सावधान मानद मद हीना। धीर धर्म गति परम प्रवीना। आज साधु-संत काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के जाल में जकड़ गए हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो हजारों करोड़ की कंपनी के मालिक बन गए हैं।
राष्ट्रपिता को अपशब्द
एक संत हैं कालीचरण महाराज। इनका व्यक्तित्व फिल्मी अभिनेता जैसे है। आकर्षक दिखने के लिए श्रृंगार करते हैं। रायपुर में आयोजित धर्म संसद में इन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपशब्द तक कह दिया। कहा मैं नाथूराम गोडसे को नमन करता हूं जिन्होंने उस (.... अपशब्द ) को मार डाला। क्या यह एक संत की वाणी है? कालीचरण महाराज कहते हैं कि मैं फैशन के अनुरूप कपड़े पहनता हूं, मुझे अच्छा लगता है। मैं टीशर्ट पहनता हूं। जरी वाले कपड़े पहनता हूं, जिम जाता हूं, जिम का मुझे बहुत शौक रहा है। पूजा पाठ कब करते हैं इसका जिक्र कभी नहीं करते।साधु-संत का अर्थ
साधु का अर्थ है धार्मिक, धर्मपरायण, उत्तम कुल में जन्मा, सज्जन व्यक्ति। संन्यासियों को भी साधु कहते हैं। गरुड़ पुराण में लिखा है जो सम्मान से प्रसन्न तथा अपमान से क्रोधित नहीं होते और यदि कभी नाराज भी हो गए तो कठोर वचन नहीं बोलते, वे ही साधु हैं। साधु सुख भोग की प्राप्ति की इच्छा से विरक्त रहते हैं और संपूर्ण प्राणियों के सुख के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। साधु पराए दुख से दुखी होते हैं। दूसरों के दुखों को देखकर अपने सुखों को भूल जाते हैं, जैसे वृक्ष स्वयं सूर्य-ताप सहकर दूसरों को छाया देते हैं उसी प्रकार साधु भी कष्ट सहकर दूसरों का उपचार करते हैं। महानिर्वाण तंत्र में लिखा है जो मनुष्य देवायतन में निवास करते हैं तथा देवकल्प, दृढव्रत, सत्य-धर्मपरायण तथा सत्यवादी हैं उन्हें साधु कहते हैं। संत का अर्थ है अंजलि। धर्मात्मा, साधु या गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वाले असीम ज्ञानवान, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ साधु को भी संत कहा जाता है।
मुनि और संन्यासी का अर्थ
मुनि का अर्थ है चिंतन और मनन करने वाला। ईश्वर की सगुण भक्ति के मार्ग को पारकर निर्गुण भक्ति में प्रवेश करने वाला मुनि है। उपनिषदों में मुनियों को बहुत निग्रही बताया गया है। गीता में बताया गया है कि जिसका मन दुखों में उद्वेग रहित है और सुखों की प्राप्ति में स्पृहा नहीं रखता और जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं. ऐसे मुनि को स्थिर बुद्धि कहा जाता है। गरुड़ पुराण में लिखा है कि मुनि गण संपूर्ण वासनाओं का त्याग कर एकमात्र विष्णु में लीन रहते हैं। वे तर्पण, होम, संध्यावंदन आदि क्रियाओं द्वारा भगवान को प्राप्त करते हैं। भगवान के अतिरिक्त इस जगत में उनके लिए कोई नहीं है। वे इस संसार को नश्वर समझते हैं। वे संसार से पूर्ण विरक्त हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। सन्यास का अर्थ सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर निष्काम भाव से प्रभु का निरन्तर स्मरण करते रहना। शास्त्रों में संन्यास को जीवन की सर्वोच्च अवस्था कहा गया है।
संत का तुगलकी फरमान
हरिद्वार में आयोजित "धर्म संसद" में एक साधु ने कहा कि इस संसद से जो "अमृत" निकलेगा वो धर्मादेश होगा और लोकतांत्रिक सरकारें उसे मानने को बाध्य होंगी। यदि नहीं यह सरकारें मानतीं तो 1857 के विद्रोह से भी भयानक युद्ध लड़ा जाएगा। किसी होटल में क्रिसमस या ईद मनाया गया है तो शीशे तुड़वा दिये जाएंगे। क्या यह संतों की भाषा है। विद्रोह तो अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए किया गया था। यह संत किस हुकूमत को उखाड़ेंगे।
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Nicely differentiated Rishi,Muni and sadhu depending upon their life style ,role and responsibilities towards society.words and sentences are researched , synthesized in proper manner.
ReplyDeleteसामयिक विषय पर अच्छी प्रस्तुति है, बधाई
ReplyDeleteधन्यवाद
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