उदय सिंह
गंगा पवित्र हैं। पतित पावनी हैं। मोक्ष प्रदायिनी हैं। सदापुण्या हैं। भगीरथसुता हैं। जाह्नवी हैं। मंदाकिनी हैं। ऐसे ही सैकड़ों नामों वाली सदानीरा को कहा जाता है कि वह विष्णु के चरणों से निकलकर ब्रह्मा के कमण्डल में समाती हुई शिव की जटा में आश्रय लेती हैं। हिमालय के गोमुख से गंगोत्री हिमनद से भागीरथी नदी निकलती है और देवप्रयाग में अलकनंदा से मिल जाती है। यहीं से गंगा का निर्माण होता है, कहा जाता है कि इक्ष्वाकुवंशीय सम्राट राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ के कठोर तप के बाद गंगा का अवतरण धरती पर हुआ। इसकी पवित्रता पर लोग सौगंध खाते हैं। वाराणसी में तो इसमें स्नान करने से ही मोक्ष की प्राप्त हो जाती है। लेकिन यह सब सरित्श्रेष्ठा का अतीत है। वर्तमान में इसके अस्तित्व और हकीकत की तलहटी में जाएंगे तो ऐसा कुछ भी महसूस नहीं होगा। गाद, सिल्ट राजनीति, दुर्गंध और सड़ी हुई लाशें जरूर दिख जाएंगी।
हजारों करोड़ गंगधार में प्रवाहित
ऋग्वेद, पुराण, धर्मशास्त्र, रामायण और महाभारत से लेकर लगभग समग्र साहित्य में गंगा का ईश्वरीय महात्म्य अस्सी के दशक तक आते-आते सड़ांध और बदबू में परिवर्तित हो जाता है। ऋषिकेश और हरिद्वार तक कुछ गनीमत है, लेकिन पूरब की ओर बढऩे पर प्रदूषण और नारकीय हो जाता है। कानपुर में डुबकी लगाना तो दूर, वहां खड़े होकर सांस लेना भी मुश्किल है। गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए दशकों से नारेबाजी जारी है। अब तक हजारों करोड़ इसकी जलधारा में प्रवाहित हो चुके हैं। नतीजा सिफर है।
प्रदूषण बेरोकटोक अब भी बरकरार
1985 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई। हजारों करोड़ खर्च हुए फिर भी गंगा मैली ही रह गईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा में प्रदूषण को नियंत्रित करने लिए 2014 में नमामि गंगे परियोजना शुरुआत की। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2021 तक नमामि गंगे परियोजना के लिए 30,255 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं। यह धन कहां गया कोई नहीं जानता। निर्मल गंगा के लिए नेशनल मिशन फार क्लीन गंगा (एनएमसीजी) की स्थापना हुई, फिर भी गंगा की सेहत पर कोई खास सुधार नहीं हुआ। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने अभी हाल ही में कहा है कि पिछले 36 वर्षों से निगरानी के बावजूद गंगा की सफाई अब भी चुनौती है। सफाई के लिए आवंटित फंड के उपयोग की जवाबदेही तय करने करने की जरूरत है।
गंगा में ही गिरता जहरीला कचरा
गंगा में टिहरी बांध, फरक्का बांध और भीमगोडा जैसी विशाल बांध बने हुए हैं। इन बाधों से इसका वेग खत्म हो गया है। गंगा प्रदूषण खत्म करने के लिए इसके किनारे स्थित 48 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का आदेश भी दिया गया था, पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई है। ऋषिकेश से लेकर कोलकाता तक गंगा के किनारे परमाणु बिजलीघर से लेकर रासायनिक खाद तक कई कारखाने लगे हैं। जिसका जहरीला कचरा गंगा में ही गिरता है।
पारस्थितिकी हो रही असंतुलित
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले से बंगाल के सुन्दरवन तक 2525 किलोमीटर भू-भाग इसी महानदी के कारण सदाबहार है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल तक दर्जनों नदियां इसमें समा जाती हैं। लगभग पचास करोड़ लोगों के साथ लाखों जीव जन्तुओं का अस्तित्व इस पर निर्भर है। गंगा के पर्वतीय किनारों पर लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू, लोमड़ी, हिरण, भौंकने वाले हिरण, साम्भर, कस्तूरी मृग, बरड़ मृग, साही, तहर आदि काफी संख्या में मिलते हैं। लेकिन प्रदूषण की वजह से यह जीव विलुप्त हो रहे हैं।
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