उदय सिंह
बनारस एक बार फिर सुर्खियोंं में है। इस बार मामला लगभग 350 साल पुराना ज्ञानवापी मस्जिद विवाद का है। इसका निर्माण बनारस के मशहूर ब्राह्मण परिवार ने कराया था। मूलत: यह एक
विश्वेश्वर मंदिर था। 16वीं सदी में बादशाह जहांगीर के सहयोगी वीर सिंह देव बुंदेला इसके संरक्षक थे। सत्रहवीं सदी में मंदिर के कुछ हिस्से का नवीनीकरण किया गया। ऐसा भी कहा जाता है कि 1669 में मुगल शासक औरंगजेब के आदेश पर मंदिर का विध्वंस कर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया, जो भी हो मामला 31 साल से कोर्ट में है। गौर से देखें तो काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का मामला कमोवेश अयोध्या विवाद जैसा ही रुख अख्तियार कर रहा है। हालांकि अयोध्या मामले में मस्जिद थी और इसमें मंदिर-मस्जिद दोनों हैं।
विवाद की शुरुआत कुछ इस तरह से हुई। पिछले साल बनारस की पांच महिलाओं ने लोकल कोर्ट में एक वाद दायर कर ज्ञानवापी मस्जिद परिसर स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा करने की इजाजत और सर्वे कराने की मांग की। कोर्ट ने सर्वे की इजाजत भी दे दी। कोर्ट के आदेश पर सर्वे हो चुका है। हिंदुओं का कहना है ज्ञानवापी में 1991 से पूर्व की स्थिति कायम हो और परिसर को नियमित दर्शन-पूजन के लिए सौंपा जाए। हिंदू पक्ष के मुताबिक 1669 में औरंगजेब ने यहां काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई थी। मुस्लिम पक्ष अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी इस बात से इनकार करता है। उनका कहना है कि यहां मंदिर नहीं था। मामले में हिंदू पक्ष की तीन प्रमुख मांगे हैं। पहली मांग है कि कोर्ट ज्ञानवापी परिसर को काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर का हिस्सा घोषित करे। दूसरी मांग मस्जिद ढहाने और मुस्लिमों के यहां आने पर प्रतिबंध लगे। और तीसरी मांग यहां पर मंदिर के पुरर्निर्माण की अनुमति है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 21 अप्रैल को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने के सिविल जज वाराणसी के आदेश को चुनौती देने वाली अंजुमन इंतजामिया मस्जिद की याचिका खारिज कर दी थी। मस्जिद में सर्वे का मामला अब सर्वोच्च न्यायालय पहुंच चुका है। मस्जिद कमेटी ने शीर्ष कोर्ट में याचिका दाखिल कर उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी है। मस्जिद कमेटी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मामले पर जल्दी सुनवाई मांगी गई थी। कोर्ट से यथास्थिति कायम रखने का आदेश देने का आग्रह किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आदेश देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह पहले केस की फाइल देखेगा।
आठ अप्रैल 2022 को मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता अजय कुमार मिश्र को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया। जिसे विपक्षी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कमीशन कार्यवाही रोकने की गुहार लगाई। हाईकोर्ट ने 12 मई 2022 को याचिका खारिज कर एडवोकेट कमिश्नर बदलने की मांग को ठुकरा दिया और पांच दिनों में रिपोर्ट सौंपने को कहा है। 1991 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने एक कानून पारित किया था सेस ऑफ वरशिप एक्ट। इसके मुताबिक 15 अगस्त 1947 में जो धार्मिक स्थल जिस रूप में थे, वह उसी रूप में रहेंगे। उसके साथ छेड़छाड़ या बदलाव नहीं किया जा सकता।

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