Thursday, 10 March 2022

राजनीति की "माया"


उदय सिंह

चुनाव में हार जीत ही होती है। एक हारता है तो दूसरा दल जीतता है। इसमें अचरज जैसी बात नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में एक नई और "खास बात" है, बहुजन समाज पार्टी का समाप्त होना। बसपा खत्म होने की कगार है। देशभर में इसके समर्थक इन दिनों असमंजस और दुविधा में हैं, कि कहां जाएं। फिलहाल पंजाब में आम आदमी पार्टी तो उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है, जिसका परिणाम दोनों राज्यों में देखने को मिला है। लेकिन यह स्थायी है कि नहीं, यह तो समय ही बताएगा। बसपा दलित वोटों के आधार पर एक खास वर्ग की बहुत बड़ी संख्या का प्रतिनिधित्व करती है। पार्टी का अस्तित्व खत्म होने से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने वोटों को भाजपा के शिफ्ट कर दिया। उन्होंने अपने मतदाताओं से स्पष्ट कह दिया था कि वह भाजपा को वोट करें। अपने राजनीतिक जीवन में बसपा का कोई उत्तराधिकारी भी नहीं तैयार नहीं होने दिया। अंत में पूरा जनाधार उन्हीं को सौंप दिया जिसे वह धुर विरोधी और मनुवादी कहती थी। ऐसा उन्होंने क्यों किया इसमें उन्हीं का व्यक्तिगत लाभ और स्वार्थ निहित है। तो क्या अब यह मान लिया जाए कि मायावती राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठना चाहती हैं। दलितों में विश्वास पैदा करने के लिए भाजपा रामनाथ कोविन्द को राष्ट्रपति बनाया था। 

समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ भारत रत्न भीमराव रामजी अम्बेडकर के जन्मदिन पर 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना हुई। संस्थापक थे पंजाब के रोपड़ जिले में 15 मार्च 1934 पैदा हुए कांशी राम थे। कांशी राम ने देश में बिखरे दलित वोटों को संगठित करने का अथक प्रयास किया, जिसका पूरा लाभ मायावती को मिला। वह एक सशक्त राजनीतिज्ञ के तौर पर उभरीं और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं। वह सनातन हिंदू विचारधारा के खिलाफ दलितों को साधने में कामयाब रहीं। उनके भाषणों में मनुवाद और मनुवादी हमेशा निशाने पर रहते। शायद इसी लिए बुद्धिज्म में उनकी आस्था ज्यादा थी। यही कारण रहा कि पिछड़ी जातियों के लोगों में भी बुद्धिज्म का अंकुरण फूटा और बड़ी संख्या में बौद्ध हो गए। 

बाबा साहेब अम्बेडकर बंधुत्व की भावना और समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे। इसके जरिये ही आदर्श समाज बनाना चाहते थे। हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और छुआछूत से आजिज होकर 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। उनकी कल्पना आधुनिक, वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत विचारों वाले देश की थी। अछूतों से सामाजिक भेदभाव से बहुत क्षुब्ध थे, इसके खिलाफ अभियान चलाया था और दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया। देवताओं के संजाल को तोड़कर एक ऐसे मुक्त मनुष्य की कल्पना कर रहे थे जो धार्मिक होने के साथ जीवन मूल्यों के महत्व को समझे। उनका कहना था कि किसी देश का यदि राजनीतिक लोकतंत्र मजबूत करना है तो उसके लिए संसदीय लोकतंत्र की मजबूती पर ध्यान देना होगा। उनकी इसी विचारधारा को दलित नेता के मसीहा कहे जाने कांशी राम और मायावती जमीन से जोड़कर आगे ले गये। 

 भारतीय जनता पार्टी से अंदर ही अंदर समझौता होने के कारण ही इस बार मायावती विधानसभा चुनाव में बहुत ही सक्रिय नहीं दिखीं। हो सकता है सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को इसकी भनक लगी हो लेकिन वह दलित वोटरों को हथिया नहीं सके। उनके लिए आने वाला समय और चुनौतीपूर्ण होगा। 2027 के विधानसभा चुनाव में बहुत तेजी से शीर्ष की ओर बढ़ रही आम आदमी पार्टी से उन्हें जूझना पड़ेगा। जिसने पहले दिल्ली और अब पंजाब हो फतह कर लिया है। पहले उनके साथ नेताजी मुलायम सिंह का बनाया जनाधार जुड़ा था, लेकिन अगले चुनाव में नेताजी का असर काफी कम हो चुका होगा। जनता आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प के तौर पर देख रही है।

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