उदय सिंह
एक कहावत है, आस पराई जो तके जीवित ही मर जाए। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की का हाल भी कुछ ऐसा ही है। इधर के रहे न उधर के। नाटो के चक्कर में पूरे यूक्रेन को खंडहर बना दिए। लेकिन कई मायनों में यूक्रेन-रूस युद्ध ने दुनिया को बड़ा संदेश दिया है। इसकी वजह से विश्व शक्ति संतुलन नया आकार ले रहा है। जैसे शक्तिशाली जर्मन साम्राज्य स्थापित करने के लिए ओटो फॉन बिस्मार्क ने 19वीं सदी में फ्रांस, इंग्लैंड और ऑस्ट्रिया से शक्ति संतुलन का सिद्धांत अपनाया था, कुछ वैसे ही समीकरण की आकृति 21वीं सदी में एशिया में बनती दिख रही है। अपने सतही मुद्दों को फिलहाल ठंडे बस्ते में डालकर भारत, रूस और चीन करीब होते दिख रहे हैं। रूस से रिश्ते तोड़ने को लेकर भारत पर यूरोपीय देशों और अमेरिका की ओर से काफी दबाव बनाया जा रहा है, बावजूद इसके भारत अपनी राय और फैसले पर अडिग है, लेकिन भविष्य में भारत पर यह दबाव और बढ़ेगा। रणनीति यह है कि रूस को जी-20 की बैठक से बाहर करने में भारत पहल करे, क्योंकि 2023 में जी-20 की बैठक भारत में होगी।
परिणाम भुगतने की चेतावनी:
अमेरिका के उप राष्ट्रीय सलाहकार दलीप सिंह ने अभी हाल ही में कहा कि रूस पर लगाए प्रतिबंधों का पालन जो देश नहीं कर रहे हैैं, उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। इस लिए भारत को रूस से ज्यादा ईंधन खरीदने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यह भी कहा कि यदि चीन ने एलएसी को पार किया तो रूस मदद नहीं करेगा। उनके बयान के बाद रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत की यात्रा पर पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात किए। काबिले गौर यह है कि पिछले लगभग दो सप्ताह में ब्रिटेन, ग्रीस, मैक्सिको व आस्ट्रिया समेत कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष, मंत्री और विदेश सचिव भारत दौर पर आए, प्रधानमंत्री मोदी को किसी से मिलने की फुर्सत नहीं मिली, लेकिन रूस के विदेश मंत्री से मुलाकात करने लिए वह समय निकाल लिये। यूक्रेन के हालात और द्विपक्षीय रिश्तों के साथ तमाम महत्वपूर्ण बिंदुओं पर वार्तालाप हुई। रूस भारत को अधिक से अधिक ईंधन बेचने को तैयार है, और भारत खरीदने को रज़ामंद है।भारत का बढ़ता महत्व:
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत आने से पहले चीन भी गए थे। चीन के विदेश मंत्री वांग यी अघोषित यात्रा पर भारत आये और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बातचीत की। दोनों देश एक-दूसरे के लिए खतरा न बनने और मतभेदों को दूर करने पर सहमत हुए हैं। एक जमाने में माओ त्से-तुंग ने भी भारत के महत्व को स्वीकार किया था। उनका नारा था कि दोनों देशों को साथ-साथ खड़े हो जाना चाहिए, वे विश्व में महत्वपूर्ण तत्व होंगे। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का यह कहना कि भारत रूस-यूक्रेन शांति स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकता है, यह बयान अमेरिका और पश्चिमी देशों को मुंह चिढ़ाने वाला है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी के जाने के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात किए। इसके बाद वाराणसी में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन किया।
शक्तिहीन संयुक्त राष्ट्र:
रूस की प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े ग्राहक यूरोपीय देश ही हैं। यदि रूस गैस आपूर्ति रोक देता तो अफरातफरी मच जाएगी। शायद यही कारण है कि अमेरिका यूरोप के लिए पेट्रोलियम का अब तक का सबसे बड़ा भंडार खोल दिया है। पश्चिमी देश ईंधन के मामले में काफी हद तक रूस पर निर्भर हैं। भारत यात्रा पर आए जर्मनी के विदेश नीति सलाहकार जेंस प्लोटनर ने कहा कि यूक्रेन के खिलाफ जारी रूसी आक्रमण रुका नहीं तो इसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैैं। उधर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की अमेरिका और पश्चिमी देशों से मदद की भीख मांग रहे हैं। अमेरिका के आगे दुम हिलाने वाले संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस भारत, चीन और इजरायल के साथ कई देशों से रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने का रोना रो रहे हैं।
पुराना हुआ निर्गुट का चोला:
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत नीतियां अलग थीं। तब वह निर्गुट संगठन में शामिल हुआ। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गुट निरपेक्षता और उसके संगठन का स्वरूप दिया। उनका मानना था कि एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र और गरीब देशों को बड़ी महाशक्तियों के गुटों से फायदे के बजाय नुकसान ही होगा। इसलिए वह मोहरा नहीं बनेंगे। गुटनिरपेक्षता का अर्थ था, हर मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से सही या गलत की स्वयं पहचान करना। इसकी स्थापना 1961 में हुई थी। अब तक इसके 120 सदस्य अधिक हो चुके हैं। इसके सदस्य देशों ने तय किया था कि विश्व दोनों ध्रुवों का साथ या विरोध में नहीं रहेंगे। हालांकि भारत शुरू से ही सोवियत संघ से सैन्य हथियारों को खरीदता रहा है। भारत की सोवियत संघ के साथ 1963 में महत्वपूर्ण हथियार संधि की शुरुआत हुई। 1964 और 1965 में तीन संधियों पर हस्ताक्षर किए गए। ऐसे में सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बन गया। दोनों के संबंध नई मंजिल पर पहुंच गए। आज भारत रूस से सर्वाधिक हथियार मंगा रहा है।

Well researched & drafted with fact-finding s..
ReplyDeleteshandar uday ji
ReplyDeleteWah! Aapke rastriy aur anterrastiy samajh ko salam
ReplyDeleteWah! Apk rastiy aur anterrastiy samajh ko salam
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